Train Experience

जनरल डिब्बे की जि़ंदगी का सफर

दुनिया तेजी से आगे निकल रही है, हर चीज दूसरे दिन अपग्रेड होकर आ जाती है, यहां तक कि मेकओवर से इंसान बदल रहा है, मगर इन सबके बीच अगर कुछ नहीं बदला है, तो वह है - जनरल डिब्बे का जीवन। जीहां, उसमें सफर करने वाला वर्ग भी वही है और उस वर्ग का एक-एक व्यक्ति भी उसकी ढर्रे का है। ऐसा नहीं है कि जनरल डिब्बे की जि़ंदगी बदतर होती है, मगर अलग जरूर होती है। आज भी कुल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा जनरल डिब्बे में सफर करता है। अगर मैं ये कहूं कि जनरल डिब्बे में ही असल भारत की तस्वीर देखने को मिलती है, तो शायद अतिश्योक्ति नहीं होगी।
बड़े दिनों बाद या कह लें बरसभर बाद ट्रेन का सफर करने का मौका मिला। न सिर्फ ट्रेन का, बल्कि रिज़र्वेशन न मिलने से जनरल डिब्बे में बैठने का आनंद भी उठाया। जनरल के सफर की शुरुआत टिकट खिड़की पर लगने वाली लंबी लाइन से ही शुरू हो जाती है। अब तो औरतों की लाइन भी अलग नहीं लगती, इसलिए लंबी बारी के इंतजार के बाद टिकट लेकर बाहर निकलने की खुशी उतनी ही होती है, जितनी किसी जंग को जीतने की होती है। इसके बाद शुरू होती है भीड़ के साथ जनरल डिब्बे में प्रवेश करने की जद्दोजहद। जैसे-तैसे डिब्बे के अंदर चढ़ जाएं, तो सीट को हथियाने की कवायद। खचाखच भरी भीड़ में सीट पर बैठे लोगों से बैठने के लिए थोड़ी-सी जगह मांगना, ऐसा ही है जैसे किसी नेता का जनता से वोट मांगना। सीट मिल जाए, तो आपका सौभाग्य, वरना करो सफर खड़े-खड़े, जब तक कोई यात्रा उठे न। ध्यान दीजिएगा जरा कि यहां अकड़ काम नहीं आती, आप होंगे कहीं के मैनेजर लेकिन वहां तो आप भी उनके बीच के एक हिस्से ही होते हैं। नौकरी के लिए डिग्री काम की होगी और अंग्रेजी में गिटर-पिटर भी, मगर जनरल डिब्बे में उन लोगों के बीच सीट मिल जाना आपकी किस्मत ही होती है। यहां कई बार इंटेलिजेंसी भी हार जाती है।  
डिब्बे में ठसाठस भरे लोग लगभग एक-दूसरे पर चढ़ते हुए। सीट पर आलथी-पालथी मारकर बैठे महिला-पुरुष और उस पर खड़े हुए लोगों को जगह न देने पर उनका ताना कि - रिज़र्वेशन करवाकर बैठना था, आम जुमला है। हर स्टेशन पर चढ़ते मंूगफली वाले की आवाज, अखबार बेचने वालों की आवाजें, यहां तक कि बालश्रम का सबसे बड़ा उदाहरण ट्रेन में ही देखने को मिलेगा, 1-1 रु. में गुटके बेचते छोटे बच्चे इस बात के साक्षी हैं।
ट्रेन के गेट पर खड़े होकर हवा से बातें करती गाड़ी का आनंद उठाते सारे युवा, विंडो वाली सीट हड़पने के लिए खींचतान करते बच्चे, ये ही आम नजारा होता है किसी भी ट्रेन के जनरल डिब्बे का।
एक-दूसरे से पूरी तरह अंजान लोग कैसे लंबे सफर में एक-दूसरे के दोस्त बन जाते हैं, वह भी देखा। ऐसे ही आमने-सामने की सीट पर बैठे कुछ लोगों ने अपने लाल गमछे को गोद में बिछाकर ताश खेलना भी शुरू कर दिया था। वहीं अगले खाने में कुछ लोगों की जोर-जोर से आवाज़ें आ रही थीं, जो अन्ना हजारे के अनशन और राजनीति पर जमकर अपनी-अपनी राय दे रहे थे, जिसे न चाहते हुए भी अन्य लोगों को सुनना ही था। सब अपने-अपने कामों में मशगूल थे कि अचानक कहीं से दो लोग डिब्बे के अंदर भीड़ को चीरते हुए लगभग भागते से नजर आए। पीछे-पीछे एक आवाज़ सुनाई दी- बड़े बाबू भाग रहे हैं दोनों। बस दूसरी तरफ खड़े बड़े बाबू ने उन्हें धर दबोचा। मजारा समझते देर नहीें लगी- वे दोनों ही व्यक्ति बिना टिकट यात्रा कर रहे थे और बड़े बाबू यानी टीसी ने उनकी कॉलर पकड़ी और थाने में बंद करने की धमकी देते हुए उन्हें लेकर अपने जूनियर को (वही जिसने उन्हें बड़े बाबू कहकर आवाज लगाई थी) अगले स्टेशन पर उतरने का आदेश सुनाया। मैंने पहले कहा था न कि जनरल डिब्बे में किस्मत काम आती है। ये दो बेचारे बदकिस्मत थे, इसलिए टीसी के हत्थे चढ़ गए, वरना कुछ बिना टिकट यात्री दूर से ही टीसी को देखकर कभी बाथरूम में छुपते हैं, तो कभी भीड़ में गुम हो जाते हैं। जनरल डिब्बे में इस लुका-छिपी के खेल में जो जीत गया, वह सिकंदर वरना जेल के अंदर।
अपनी बात के पक्के बड़े बाबू अगले स्टेशन में अपने जूनियर के साथ उन दोनों बिना टिकट यात्रियों को लेकर नीचे उतर गए। उनके उतरते ही यात्रियों में खुसर-पुसर शुरू हो गई, कोई कह रहा था- बड़े बाबू का आज का कोटा पूरा हो गया। तो कोई बोल रहा था- कुछ नहीं जेब गर्म करके बड़े बाबू छोड़ देंगे उन दोनों को। असल में क्या हुआ - ये तो बड़े बाबू और वे दोनों व्यक्ति ही जानते हैं। इतना डीप में जाने में अपन को क्या करना है!
मेरे जनरल डिब्बे का सफर तो यहीं खत्म हो गया, मेरा गंतव्य आ चुका था और मैं एक बार फिर भीड़ में खड़े होकर गेट से बाहर निकलने की तैयारी कर रही थी, जिस तरह अंदर घुसी थी। चलते-चलते आवाज सुनने को मिली- चिंता मत करो धक्का-मुक्की के साथ खुद ही एक्जिट हो लेंगे।

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