औपचारिकताओं से भरे माहौल में कौन है सच्चा?
'कैसी हैं बिंदु मैम, जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं। आप जिएं हज़ारों साल।Ó किसी ने बिंदु मैम को बर्थडे विश किया। जैसे ही बिंदु मैम ने उसके डिपार्टमेंट की सीमा पार की, उस बंदी ने मुंह टेढ़ा किया और 'बुरे लोगों की भगवान को भी जरूरत नहीं है लगता,Ó जैसी सत्रह बुराइयां करती हुई निकल ली वहां से। फिर किसी ने पूछा कि यार तुम तो उन्हें अभी-अभी बड़े प्यार से विश कर रही थीं, लंबी उम्र की दुआएं दे रही थीं, फिर अचानक इतनी चिढ़ क्यों? जब पसंद नहीं करती हो, तो सामने ऐसी नौटंकी की जरूरत क्या है? इस पर उस बंदी का जवाब था- क्या करें यार, फॉर्मेलिटी करनी पड़ती है। सीनियर है, पता नहीं, कब काम पड़ जाए उससे। बेवजह बुराई कौन मोल ले।
बात यहीं आकर नहीं खत्म होती, आप जिसे नापसंद करते हैं, मुंह पर तो उससे शहद वाली वाणी में बोलेंगे, मगर आपका कोई साथी उससे बात करे, तो तुरंत टीम विभाजन कर देंगे- तू मेरी टीम में है या उसकी। बात बच्चों वाली ज़रूर है, पर ऐसी हरकतें पढ़े-लिखे समझदार वयस्क ही ज्यादा करते हैं।
ये तो थी ऑफिस के वातावरण की एक झलक। घर के आस-पास भी तो ऐसे ही कुछ नज़ारे देखने को मिलते हैं। पिंटू की मम्मी बड़े प्यार से मिसेज शर्मा को दिलासा दे रही थीं- 'अरे किसी के कहने से क्या होता है मैं कह रही हूं न कि आप बहुत अच्छी हैं। सबका ध्यान रखती हैं। मिश्राइन तो आपसे चिढ़ती है, मुझे पता है। इसलिए यहां-वहां आपकी बुराई करती फिरती है। आप उससे बात ही मत किया कीजिए।Ó मिसेज शर्मा के जाने के बाद पिंटू ने अपनी मम्मी से पूछा- 'मां, आप भी तो यही कहती हैं कि शर्मा आंटी 'अच्छी औरतÓ नहीं हैं। फिर आप उनसे इतने प्यार से क्यों बात कर रही थीं।Ó नन्हे पिंटू की बात गलत नहीं थी। मगर बात घूम-फिरकर वहीं आ गई न कि - पता नहीं कब काम पड़ जाए! सीधे मुंह बुराई कौन मोल ले।
लगभग ऐसा ही माहौल आजकल घर-बाहर सब जगह देखने-सुनने मिल रहा है। औपचारिकताओं से भरे इस माहौल में समझ में नहीं आता कि कौन सचमुच हितैशी है और कौन कलाकार, जो हितैशी बनने की एक्टिंग कर रहा है। दरअसल लोगों ने अब अच्छेपने का लबादा-सा ओढ़ रखा है। मुंह पर कुछ और, और पीठ पीछे कुछ और।
कभी-कभी समझ नहीं आता क्यों करते हैं हम औपचारिकताएं। जिसे पसंद नहीं करते, तो नहीं करते, ये जताने की क्या जरूरत है कि उसे बहुत पसंद करते हैं। ऐसा करके कहीं न कहीं महान बनने की होड़ जैसी लगती है। बस, लोगों को ये न लगे कि हम फलां से चिढ़ते हैं।
यही नहीं, कई बार तो लोग दोस्त, पति-पत्नी, भाई-बहन या और भी ऐसे कई आपसी रिश्ते में भी औपचारिकताएं निभाते हैं। ये सोचकर कि कहीं रिश्ते में खटास न आ जाए। ये क्यों नहीं सोचते कि अगर रिश्ते सच्चे हों, तो उन्हें संभालना नहीं पड़ता। और जिन रिश्तों को ज्यादा संभालना पड़ता है, वो सच्चे नहीं होते। ऑफिस में बनाए रिश्तों में भी यही बात लागू होती है। जबर्दस्ती आप किसी की राय अपने बारे में या अपनी राय किसी के बारे में नहीं बना सकते।
जो अपना नज़र आता है, वो अपना नहीं होता। और कई बार जिससे अबोला रहता है, दूर-दूर तक लेना-देना नहीं होता, वो बिन बोले ही दुश्मन सा नज़र आता है। औपचारिकतों से बंधे कई बार हम अपने दिल की सुनना भी बंद कर देते हैं। जो है, वही दिखना भी चाहिए। फिर चाहे वह पसंद हो या नापसंद। बस, नियम इतना होना चाहिए पसंद हो, तो जरूरत से ज्यादा प्यार न उमड़े और नापसंद हो, तो जरा-भी नफरत न छलके। लोग क्या सोचते हैं, उसके बारे में बिल्कुल मत सोचिए। याद रखिए, जि़ंदगी का एक बहुत आसान फंडा है- 'लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं, अगर ये भी हम ही सोचने लगें, तो बेचारे लोग क्या करेंगे?Ó है न!
- प्रिया 'लय '
Comments
Post a Comment