अच्छा हो, इंसान की तरह पेश आएं ...


कई बार पढ़े-लिखे लोग भी ऐसी हरकत कर बैठते हैं, जिससे वे न सिर्फ खुद को अपमानित करते हैं, बल्कि पूरे समाज को कटघरे पर लाकर खड़ा कर देते हैं। एक बार अपने बर्ताव पर नज़र डालिए, अगर आप सामने वाले की जगह होते, तो क्या वैसा ही व्यवहार अपने लिए बर्दाश्त कर पाते...


हमारे देश में आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो देश के काम में लोगों की कोई मदद नहीं करते, फिर भले ही उस मदद में उनका ही फायदा क्यों न हो। इसका एक उदाहरण मुझे कुछ दिनों पहले देखने को मिला। हुआ यूं कि शाम सात बजे करीब एक सज्जन ने आकर हमारे घर पर दस्तक दी। मां का घर इसलिए लिखा, क्योंकि मैं शादीशुदा हूं और मेरा घर भी उसी कॉलोनी में है। अत: मैं उनसे मिलने घर गई हुई थी। खैर, मैं उस वक्त मोबाइल पर थी, मैंने जल्दी-जल्दी बात खत्म की और उन सज्जन से मुखातिब हुई।
वे सज्जन सरकारी कर्मचारी थे और जनगणना के लिए हमारी कॉलोनी के दौरे पर निकले थे। मैंने उन्हें बैठने को कहा और उन्होंने अपना फॉर्म वगैरह निकालकर हमसे जानकारी लेनी शुरू की। इस बीच मैंने बेटे को आवाज़ लगाकर उन्हें एक गिलास पानी पिलाने को कहा। फॉर्म भरते-भरते हमारी सामान्य बातचीत भी शुरू हुई। मैंने उनसे पूछा कि मेरा घर दूसरी लाइन में है, तो उसकी जानकारी किसको देनी होगी। उन्होंने मुझे एक फोन नंबर नोट करवाया और कहा कि उस तरफ की लाइन की जि़म्मेदारी फलां सज्जन को सौंपी गई है।
मैं और मां दोनों ही बैठकर उनसे पूछे जा रहे सवालों का जवाब देने लगे। बीच में मैंने उनसे पूछा कि वे कहां रहते हैं। जवाब मिला- गोविंदपुरा। उन्होंने बताया सुबह 7 बजे से निकलते हैं और घर पहुंचते-पहुंचते रात के 11 भी बज जाते हैं। सुनते ही मैंने मां को अंदर ले जाकर उन्हें थोड़ा-बहुत नाश्ता करवाने को कहा। मां एक प्लेट में नाश्ता ले आईं। तब तक अंकल का फॉर्म भी भरा जा चुका था। मैंने उन्हें नाश्ता करने को कहा। प्लेट उठाकर उन्होंने बताना शुरू किया, 'आपके व्यवहार ने मेरे दिनभर की थकान कम कर दी। पर हर व्यक्ति आपके परिवार जैसा सहयोगी आचरण नहीं अपनाता। यहीं नज़दीक ही एक घर की बात बताता हूं। मैंने उनके घर पर दस्तक देकर आवाज़ लगाई, तो सजी-धजी मुद्रा में एक महिला बाहर निकलीं और मेरे हाथ में फाइल वगैरह देखकर दोबारा अंदर चली गईं। 2 मिनट बाद आकर मुझे पांच रुपए देने लगीं। मुझे उनकी सोच पर हंसी आ गई। मैंने उन्हें समझाया कि मैं कोई चंदा लेने वाला नहीं हूं, मैं सरकार के आदेश पर जनगणना करने निकला हूं। उन्हें जनगणना का अर्थ नहीं पता था। मैंने समझाया, तो बोलीं बाद में आना अभी टाइम नहीं है। मैंने सोचा हो सकता है घर पर कोई न हो, स्वयं जानकारी नहीं दे पाएंगी, इसलिए बाद में बुला रही हैं। मैं उनके कहे अनुसार दूसरे दिन पहुंचा, तो भी उन्होंने वही जवाब दिया। तीसरे दिन निकला, तो सोचा इस बार घर के किसी और सदस्य से बात करूंगा, मगर मुझे देखते ही वे अंदर चली गईं और बच्चे को बाहर भेजकर कहलवा दिया कि घर पर कोई नहीं है। अब मुझे थोड़ा गुस्सा आ गया। मैंने रजिस्टर में उनके नंबर के आगे लिख दिया 'इस नंबर के घरवाले जनगणना देने से मना कर रहे हैं।Ó देखने में सभ्य दिखने वाली महिला के व्यवहार ने मुझे बहुत दुखी किया। कुछ लोग आपके जैसे होते हैं, जो चाय-पानी का पूछ लेते हैं, कुछ ऐसे भी हैं, जो खड़े-खड़े ही जानकारी लिखवाते हैं और पानी तो दूर बैठने का भी नहीं कहते। उन्हें लगता है हम सरकारी काम कर रहे हैं, इसलिए धूप में घूम-घूमकर घरों पर जाकर जनगणना करना हमारा काम है, इसमें हमदर्दी क्या दिखाना। यही नहीं, कुछ लोग तो सही-सही जानकारी भी नहीं देते, उन्हें लगता है कि अगर वे बता देंगे कि उनके घर में फ्रिज-कूलर-गाड़ी है, तो सरकार उनसे पैसे वसूल करेगी। जनगणना को लेकर लोगों में आज भी कितनी बड़ी गलतफहमी फैली हुई है।
जनगणना देने के लिए आपके सहयोग भरे व्यवहार और मुझे इंसान समझकर चाय-पानी पूछने के लिए आपका ढेर सारा धन्यवाद।Ó
उनके जाने के बाद मुझे बहुत दुख हुआ कि हम सरकार के आदेशानुसार महत्वपूर्ण कार्य कर रहे लोगों के साथ सहयोग भरा व्यवहार भी नहीं अपना रहे?

- प्रिया 'लय'

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