तुम यूं बिना कुछ कहे क्यों चली गईं


दिन 13 मई, वक्त शाम का, जगह कानपुर। खबर मिली कि ३२ वर्षीय दो बच्चों की मां ने खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली। कानपुर से यूं तो मेरा कोई सीधा संबंध नहीं है, न ही मेरा वहां कोई घरोबा ही है, मगर फिर भी एक लगाव तो था, लेकिन अब वो भी नहीं रहा। कोई रहता था मेरा, जिससे न तो खून का रिश्ता था, न रिश्तेदारी। लेकिन अब इस शहर से एक नया रिश्ता जरूर बन गया है- बैर का।
14 जून सुबह का वक्त, खाने की तैयारियों में लगी मैं दौड़-भाग कर रही थी कि अचानक मोबाइल बजा। आवाज सहेली की थी। एक मिनट तक तो वो रोती रही, मैं समझ नहीं पाई, बस उसे चुप कराने में लगी थी। धीरे-धीरे जब उसने खुद को संभाला, तो बस इतना ही बोलकर फोन रख दिया कि - संध्या ने 13 मई को आत्महत्या कर ली, मुझे आज ही पता चला।
मैं स्तब्ध। न कुछ बोलते बना, न कुछ सुनते। किचन से निकली और खुद को ये यकीन दिलाने में लगी रही कि हो सकता है मैंने गलत सुना हो। अभी दिसंबर में ही तो मिले थे हम। पूरे दस सालों बाद। उसके गालों पे पड़ते डिंपल ने माथे की शिकन का जरा भी अंदाज़ा नहीं लगने दिया, हर बार की तरह। संध्या ने ऐसा कुछ भी नहीं बताया, जिससे हमें उसकी मुस्कराहट के पीछे छुपी कोई अनहोनी घटने की आशंका की खबर लग पाती। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ होगा, जिसकी भनक तक हमें नहीं लगी।
पूरी बात पता करने हम उसकी मां के घर पहुंचे, तो उन्होंने बताया कि उसने आग लगाकर आत्मदाह किया था। 99 प्रतिशत जल जाने के बाद उसके शरीर से सिर्फ राख निकल रही थी, और आंखों से लगातार आंसू। तीन दिन अस्पताल में तड़पने के बाद वह न सिर्फ हमें बल्कि अपने जिगर के टुकड़ों को भी हमेशा के लिए छोड़कर चली गई।
 कुछ दिनों पहले एक लापरवाही से मेरा दायां हाथ थोड़ा जल गया। शरीर का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा जल जाने पर मुझे तो तकलीफ हुई ही, मेरे परिवार को भी दुख होता रहा। फिर संध्या तो एक प्रतिशत छोड़कर राख हो गई थी, उसकी तकलीफ का अंदाजा मैं जीते जी नहीं लगा सकती, न ही उसके परिवार के दुख का।
ये मानव प्रकृति है कि जो हमें चाहते हैं, हम उन्हें नज़रअंदाज करते रहते हैं और जिन्हें हम चाहते हैं, वो हम पर ध्यान भी नहीं देते। जिनसे हमें प्यार होता है, वो ही हमारा दिल दुखाते हैं, और जो हमें प्यार करते हैं, हम उनका दिल दुखाते रहते हैं।
हमारे मन में बस एक ही बात बार-बार कौंध रही है कि काश, उसने एक बार अपने जीवन में चल रही परेशानियों का जि़क्र किया होता, तो शायद हम सारे दोस्त मिलकर उसका समाधान निकाल पाते। समस्या को अगर जड़ से खत्म न कर सकते होते, तो कम से कम समस्या को इतनी भी न बढऩे देते कि नतीजे में हमें उसे खोना पड़ता। उसके इस निर्णय से हमारी मित्र मंडली हिल चुकी है। साथ ही उन दो मासूमों के चेहरे पर नजर आते सवालों के जवाब किसी के भी पास नहीं हैं। वही एकमात्र लड़की थी, जिसने एक बार मुझे जीवन की कठिनाइयों से यह कहकर पलभर में निकाल लिया था कि मन कमजोर होता है, तो परिस्थितियां समस्या बन जाती हैं, जब मन स्थिर होता है, तो परिस्थितियां चुनौती बन जाती हैं और मन प्रबल होता है, तो परिस्थितियां अवसर बन जाती हैं। मुझे सिखाकर वह जीवन का यह महत्वपूर्ण पाठ कैसे भूल गई? इतना बड़ा फैसला लेने से पहले उसने एक बार ये सोचा होता कि उसके जाने के बाद उन दो मासूम बच्चों का क्या होगा। उन्हें वह किसके भरोसे छोड़ गई?
गहराई से सोचा जाए, तो सच में बात करने से ही बात बनती है। जो दूर हैं, उनके नजदीक रहें। उन्हें कभी भी नज़रअंदाज़ न करें, खासतौर से जो आपकी बहुत परवाह करते हों। वरना, किसी दिन आपको अहसास होगा कि पत्थर जमा करते-करते आपने हीरे गंवा दिए। अगर आपको ये महसूस होने लगे कि आपका कोई अपना लगातार परेशान नजर आ रहा है, तो उसे उलझन से निकालने की कोशिश करें, शायद आपकी कोई समझाइश, सिर पर रखा प्यार-भरा हाथ उसकी जि़ंदगी बचा ले।

- प्रिया 'लय'

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