विश्वास ही बनाता है इंसान को भगवान

जीहां, एकमात्र प्रोफेशन, जिसमें कार्यरत आम आदमी भगवान की उपाधि पा जाता है - डॉक्टरी। धरती पर मौजूद ये भगवान लोगों को नया जीवन देने का काम करते हैं। हाल ही मैं मुझे एक अनुभव हुआ। मेरी परिचिता हॉस्पिटल में एडमिट हुईं। जिस वॉर्ड में वे एडमिट थीं, वहां आस-पास के बेड पर कुछ और मरीज भी थे। थोड़ी देर में ऊंची कद-काठी वाले, गोरे-चिट्ठे, आंखों पर चश्मा चढ़ाए, करीब-करीब 35-38 साल के एक व्यवस्थित नौजवान ने प्रवेश किया। वह बारी-बारी से सभी के हाल-चाल ले रहा था। पहले हमें लगा ऐंवई कोई बंदा होगा, जो दुनियादारी निभा रहा है, फिर जैसे ही उसने सिस्टर को आवाज लगाई, और मरीज की नब्ज पकड़कर उसका मर्ज जाना,
तब जाके बात समझ आई कि ये तो डॉक्टर है, मगर जूनियर। बस ये भांपते ही कि वह जूनियर डॉक्टर है, परिचिता ने धीरे से कहा, 'अरे किसी सीनियर डॉक्टर को बुलाओ, ये अभी-अभी बना डॉक्टर कहां मेरा दर्द समझ पाएगा। ये तो प्रैक्टिस कर रहा है। देखा नहीं, स्टेथोस्कोप और एप्रिन भी नहीं पहना।Ó
हालांकि उनकी बात से हम सहमत नहीं थे, मगर उनकी तसल्ली के लिए लगे सीनियर डॉक्टर को खोजने, तो पता चला फिल्हाल कोई सीनियर डॉक्टर हॉस्पिटल में उपलब्ध नहीं है। खैर, वह जूनियर डॉक तो अपनी ड्यूटी निभा रहा था, सो परिचिता के पास भी पहुंचा। परिचिता तकलीफ में थीं, इसलिए 'मरता क्या न करता,Ó वाली बात यहां चरितार्थ हुई। उन्होंने स्थिति से समझौता करना स्वीकार किया।
उस जूनियर डॉक ने परिचिता की तकलीफ की जानकारी ली, संभव इलाज किया और उन्हें ये आश्वासन दिया कि अगर दी जा रही खुराक को नियमित लेंगी, तो जल्द ही पहले की तरह स्वस्थ और सेहतमंद नजर आएंगी। हुआ भी यही, डॉक की बातों ने दवाओं के साथ असर किया और एक हफ्ते में ही वे भली-चंगी दोबारा उसी जूनियर डॉक्टर के पास पहुंचीं, उसे धन्यवाद कहने लगीं।
उस दिन एक बात समझ आई मरीज का इलाज करने के लिए सीनियर-जूनियर डॉक्टर की नहीं, बल्कि मर्ज समझकर तकलीफ दूर करने के लिए सही दिशा में इलाज करने वाले डॉक्टरी पेशे में कार्यरत इंसान की जरूरत है, उस पेशे को, जिसे लोग भगवान का दर्जा देते हैं। समझ नहीं आया तो बस ये कि क्या जूनियर का तमगा लगा होने से वह योग्य डॉक्टर की श्रेणी में नहीं गिना जाता। हालांकि हाल ही सुनाई दे रही जूनियर डॉक्टर की नकारात्मक खबरों ने जो हलचल मचा रखी है, उससे बहुतों का विश्वास उन परिचिता की तरह जरूर डगमगा गया है, लेकिन खत्म नहीं हुआ। इस बात का साक्षी मुझ जैसे कई लोगों का अनुभव है। जिस तरह पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, उसी तरह हर पेशे में प्रकार-प्रकार के लोग होते हैं, बात तो बस विश्वास की है।
उम्र से अनुभव का अंदाजा लगा लेने के बाद लोग उन पर बंद आंखों से विश्वास कर लेते हैं। क्या यह जरूरी नहीं कि नौजवानों में भी उसी विश्वास की दृष्टि डाली जाए। भले ही उनमें सालों के अनुभव की कमी हो, मगर जोश-जुनून और हुनर किसी उम्र और अनुभव का मोहताज नहीं। यह बात सिर्फ एक प्रोफेशन के लिए नहीं, बल्कि हर प्रोफेशन में लागू होती है।

- प्रिया 'लय'

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