शायद तब समझे एक मां की फिक्र
बहुत बार सुना कि जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो माता-पिता के दोस्त बन जाते हैं। बेटे का पैर पिता के जूतों में बन जाए, तो पिता बेटे से तेज आवाज़ में बात करने से पहले दो बार सोचता है या फिर जब बेटी मां के कद को पार कर जाए, तो मां के अंदर दोस्त ढूंढने लगती है। मैं भी मां हूं। मेरी बेटी भी मेरे कद को पार कर रही है, मैंने हमेशा उसे अपनी परछाई ही समझा। मगर ऐसा कुछ नहीं हो रहा, जैसा सुनती आ रही हूं। सबकुछ उलटा-पुलटा सा हो रहा है, 18 साल की मेरी बेटी मुझे अपना दोस्त नहीं, बल्कि दुश्मन समझती है। हर माता-पिता की तरह हमने भी घर में एक अलग कमरा उसके लिए तैयार किया। मगर मुझे क्या पता था कि मैं सिर्फ उसका कमरा ही अलग नहीं कर रही, बल्कि अपनी परछाई को खुद से अलग कर रही हूं।
उसका कमरा क्या अलग हुआ, उसने तो अपनी दुनिया ही अलग बसा ली। मुझे अपने कमरे में आता देखकर वह मोबाइल पर बात करना बंद कर देती है, उसके कमरे में चारों तरफ नजर नहीं दौड़ा सकती, वरना वो ताक-झांक करने का इल्जाम लगा देती है। मैं समझ नहीं पा रही कि आखिर मेरी परवरिश में कहां-क्या गलती हो गई। हर वक्त यही डर लगा रहता है कहीं-कुछ गलत न हो जाए। कैसे खुद को उसकी चिंता करने से रोक दूं, कैसे उसको उसके हाल पर छोड़ दूं? नहीं, मुझसे नहीं हो पाएगा ये सब।
शायद मैं ही कहीं गलतियां कर रही हूं, उसको दोष नहीं देना चाहती। लेकिन मैं समझ नहीं पा रही कि आखिर गलतियां कहां हो रही हैं। उसे मेरा बात-बात पर टोकना अच्छा नहीं लगता। मगर मैं भी दिल के हाथों मजबूर हूं। मैं उसे इसलिए टोकती हूं, ताकि वह गलत रास्ते पर न चली जाए या अगर उसके मन में कोई असमंजस की स्थिति है, तो वह मुझसे शेयर करे। मगर वो मेरी फिक्र को, जासूसी का नाम देकर मुझे अपना दुश्मन समझ लेती है। जब मुझे लगता है कि किसी मामले में उसका तरीका गलत है, तो मैं उसे डांटने लगती हूं। वह मेरी डांट को उम्र के साथ चिड़चिड़ेपन का नाम देकर किसी भी बात को समझना ही नहीं चाहती। और यह सब जानकर मैं ठगी सी रह जाती हूं।
मुझे याद है वह दिन, जब नर्स ने मेरे हाथों में एक नन्ही-सी गुडिय़ा रखी थी। उसके नन्हे-नन्हे हाथ-पैर मेरी गोद में आकर मचलने लगे। उसकी टिमटिम करती आंखें मुझे आश्चर्य से देख रही थी, मानो पूछ रही हों कि क्या तुम ही मेरी मां हो। और मैंने उसे जोर से भींच लिया था। पूरे घर में खुशहाली लेकर आई थी मेरी बेटी, इसलिए हमने उसका नाम खुशी रख दिया। खुशी रातभर जगाती थी और दिनभर सोती थी। उसके आने से पहले ही मैंने उसके लिए छोटे-छोटे झबले सिल लिए थे।
मुझे याद है वह दिन भी, जब उसने पहली बार अपने पैर ज़मीन पर जमाए और आठ कदम चलकर मेरी बांहों में झूल गई। उसके बाद खुशी ने मेरी उंगलियों को अपनी मुट्ठी से दबाकर चलना शुरू किया, फिर एक दिन मेरी उंगलियों को छोड़कर वह दौडऩे भी लगी। उस दिन मुझे पहली बार लगा बेटी बड़ी हो रही है।
ऐसा लग रहा था मानो समय तेजी से भाग रहा है। खुशी 8 साल की हो गई थी। मुझे अपनी बेटी की हर छोटी-छोटी बात पता थी, जैसे - उसका पसंदीदा रंग गुलाबी है, उसे आलू की सूखी सब्जी और पूरी बहुत पसंद है, मिठाई में उसे रसगुल्ला बहुत अच्छा लगता है, वगैरह-वगैरह।
खुशी मुझे नाराज़ नहीं देख सकती थी, मैं जब भी किसी बात पर उसे डांटती, वह थोड़ी देर बाद ही कान पकड़ते हुए मेरे कमरे में आती और मेरे गले लग जाती।
उम्र बढऩे के साथ-साथ, हमारे बीच दूरियां भी बढऩे लगीं। अब वह कॉलेज में है। इस बार जब मैंने उसके बर्थडे पर उसे गुलाबी रंग का बैग गिफ्ट किया, तो उसकी प्रतिक्रिया ने मुझे चौंका दिया। वह बोली- ममा, आई हेट पिंक कलर!
मुझे लगा वक्त बहुत आगे निकल गया और मैं अपनी 8 साल की खुशी के साथ पीछे ही रह गई। अब वह मेरी नाराजगी पर मुझे मनाने नहीं आती। मुझे याद नहीं उसने आखिरी कब मुझसे हंसकर बात की थी।
काश! वो समझ पाती कि दरअसल मेरी डांट दरअसल उसके प्रति मेरी चिंता है और मेरा टोकना मेरी जासूसी नहीं, बल्कि उसे गलत रास्ते पर जाने से रोकना है, आगाह करना है। मैं इस आशा के साथ अपना एक-एक दिन व्यतीत कर रही हूं कि एक ना एक दिन वह मुझे समझेगी। शायद तब, जब वह खुद मेरी ही तरह एक प्यारी-सी खुशी की मां बनेगी।
- प्रिया 'लय'
Comments
Post a Comment