स्वागत कीजिए बिन बुलाए आलोचक का


आप अधीर हैं? गुस्सैल हैं? जल्द ही काबू खो देते हैं? अपनी बुराइयां सुनने के आदी नहीं हैं? तो आपको जल्द ही एक अदद छिद्रान्वेशी को अपने खेमे में नियुक्त करने की जरूरत है। नहीं समझे, छिद्रान्वेशी मतलब वही आलोचक, समालोचक, समीक्षक, गुणदोष विचारक या कह लो क्रिटिक। प्यार से जिस नाम से भी पुकारो, चलेगा, बल्कि दौड़ेगा। ये वे संज्ञावाचक हैं, जिन्होंने आपके अंदर मौजूद कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी उठाई है। जैसे नगरनिगम हर गली-चौबारे की गंदगी साफ करके अपने शहर को स्वच्छ रखती है, ये भी समाज के ऐसे ही ठेकेदार हैं, जो आपके व्यक्तित्व में निखार लाते हैं।
्रअगर आपके आस-पास क्रिटिक मौजूद हैं, तो आप दुनिया के सबसे खुशकिस्मत इंसानों में से एक हैं। मुंह पर तारीफ करने वाले हज़ारों मिल जाएंगे साहब, पर आपके मुंह पर आपकी ही बुराई करने वाले जिगरवाले ही होते हैं। इसलिए इनका स्वागत कीजिए, क्योंकि ये ही लोग आपमें छुपी हुई उस खूबी की खोज करेंगे, जिसे आप नजरअंदाज करते आए हैं।
जब भी कोई आपको आपके काम की बुराई करते नजर आए, तो समझिए आप तरक्की की सीढिय़ां चढऩे लगे हैं और अव्वल दर्जे का नहीं, तो कम से कम सही दिशा में जरूर काम करने लगे हैं, इसलिए घबराइए मत सहन करने की आदत डालिए, चूंकि आपके कानों में गूंजते इन्हीं क्रिटिक के शब्द आपको ऊंचाइयों पर ले जाएंगे।
जितना बड़ा, ओहदेवाला, सभ्य, पढ़ा-लिखा क्रिटिक आपकी बुराई करेगा, आपका दर्जा उतना ही बड़ा होगा। जितने चिढ़ा देने वाले वाक्य, आपको गुस्सा दिलाने वाली हरकतें, आपके खून की लाल रक्त कणिकाओं को श्वेत रक्त कणिकाओं तक सीधे पहुंचाने वाले तीखे, चटपटे, मिर्च लगे शब्द उस क्रिटिक महाशय के द्वारा कहे जाएंगे, आपमें उतना ही ऊर्जा का विकास होगा। आपके काम की मैग्नीफाइंग ग्लास लेकर नुक्ताचीनी करता यही क्रिटिक आपके काम में निखार लाएगा। यकीन न हो, तो किसी ऐसे वरिष्ठ से पूछकर देखो, जो इन अनुभवों से गुजरा हो। 
उन खुशनसीबों में मेरी गिनती भी आती है, मेरी पाली में भी आलादर्जे के हट्टे-कट्टे क्रिटिक हैं, जो हर क्षण मुझे मेरी गलतियां बताकर मुझमें सुधार ला रहे हैं। मैं उन सभी का आज धन्यवाद करना चाहूंगी, जिन्होंने मुझे इस काबिल समझा कि वे पूरे दिलोदिमाग से, व्यस्त शेड्यूल से भी अपना बहुमूल्य समय निकालकर मेरे काम की बुराई करें। बरसभर पहले मेरा रक्तचाप भी आप ही की तरह उच्चस्तर पर पहुंच जाया करता था। चेहरे पर हर वक्त तनाव दिखता। खूब जूस पिया, फल खाए, पौष्टिक-पाचक सारे आहार किए, मगर चेहरा वही अशांत। मैं समझ ही नहीं पाती कि आखिर कारण क्या है? फिर एक दिन एक सज्जन से मुलाकात हुई, उन्होंने जो समझाया, उसका नतीजा सुखद रहा। उन्होंने कहा - आपकी बुराई करने वाले का सबसे अच्छा जवाब है मौन। मौन वह तीर है, जो सीधे क्रिटिक के दिल को भेदता है। बस अपने दिल पर हाथ रखो और उससे कहो - आल इज़ वेल बेटा। वहीं दिमाग को कहो- भूल जाए, मगर याद रखे। भूल जाए इस वक्त को, याद रखे उस वक्त को, जो लेकर आएगा आपके काम में निखार और संयम व्यवहार। अपनी ऊर्जा को बचाओ, सही दिशा में लगाओ और कुछ कर दिखाओ...। शांति ही क्रांति लाती है मेरे दोस्त।
गांधी जी ने सलाह दी थी, आपके घर की दीवार पर पान की पीक थूकने वाले पर गुर्राओ मत, बाल्टीभर पानी लेकर साफ करो। अगले दिन फिर वह थूके, तो फिर साफ करो। तीसरे दिन फिर थूके, फिर साफ करो। वो थूके, आप साफ करो, मगर गुस्से से नहीं मुस्कुराके। उस दिन तक, जिस दिन वह दीवार पर थूके नहीं, बल्कि दरवाजे की घंटी बजाकर आपसे माफी मांगे और हाथ मिलाकर कहे- आपसे मिलकर कुछ सीखने को मिला। उसके यही शब्द आपकी उपलब्धि हैं।
बात कुछ समझ आई, मेरे भाई। ऐंवई थोड़ी हम उस अहिंसावादी व्यक्ति को बापू बुलाते हैं, एक पिता की तरह सही मार्गदर्शन दिया है उसने।
अब कबीर जी को ही ले लो, कह-कह कर दुनिया से चले गए कि -
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय। जो मन खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय।।
मगर आप तभी समझे जब उस क्रिटिक से जली-कटी बातें सुनीं। अब मैं शर्तिया आपसे कह सकती हूं कि इसके बाद आप अपने अंदर मौजूद बुराइयों को दूर करने की जरूर सोचेंगे। अबकी बार जब भी इन छिद्रान्वेशी के साक्षात दर्शन हों, तो तुम कब जावोगे, कहने की बजाए तुम फिर कब आवोगे कहिएगा।

- प्रिया 'लय'

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