Book of real Friends
अभी-अभी वॉट्सएप पर एक मैसेज पढ़ा - बुरे वक्त में भी एक अच्छाई होती है, जैसे ही ये आता है, फालतू के दोस्त विदा हो जाते हैं ....
एकदम सटीक बात है। कहने को तो हमारे पास हज़ारों की संख्या में दोस्त हैं आज की तारीख में। बताइए हैं न, चैक कीजिए अपनी फेसबुक फ्रैंडलिस्ट। किस-किस की लिस्ट हज़ार से ऊपर चली गई। अब ईमानदारी से देखा जाए, तो वाकई इस लिस्ट में फ्रैंड कहे जाने वाले लोग कितने हैं?
कोई दोस्त 16 का होगा, तो कोई 60 का भी होगा। अब जो फेसबुक की फ्रैंडलिस्ट में दर्ज है, वो फ्रैंड ही तो कहलाएगा, भाई, बंधु, चाचा, भतीजा थोड़े ही होगा। क्यों? सही कहा न!
एक गेम खेलते हैं, सिर्फ खेलेंगे, अप्लाई मत कीजिएगा वरना बहुतों को बुरा लग जाएगा। तो शुरू करते हैं फ्रैंडलिस्ट से फ्रैंडों की छंटाई। सबसे पहले हज़ारों की संख्या में फ्रैंडलिस्ट में दर्ज इन तथाकथित दोस्तों में से सचमुच दोस्त कहे जाने वाले लोगों की गिनती करते हैं। अब जो संख्या बची, उसमें से उन दोस्तों को अलग कर देते हैं जो हमारे ऑफिस में हैं क्योंकि ऑफिस की दोस्ती ऑफिस तक ही होती है, ये तो आप भी बेहतर जानते हैं। दिल से पूछिए एक बात, जब ऑफिस के किसी दोस्त का इंक्रीमेंट आपसे ज्यादा होता है, तो क्या आप उसकी खुशी में खुश होते हैं, या वो अपनी खुशी को भूलकर आपके दुख में शामिल होता है? दिल पर हाथ रखकर बताइएगा। खैर, जवाब आपको मिल गया होगा, अब आगे बढ़ते हैं।
बची हुई दोस्तों की संख्या में से उन दोस्तों को डिलिट कर दें, जो यूं तो आपसे कभी बात नहीं करते, हाल-चाल नहीं लेते, मगर एफबी पर संख्या बढ़ाने के लिए दर्ज हैं। मतलब जिन लोगों से आप रैग्युलरली बात नहीं करते, जिनके साथ सुख-दुख की बातें शेयर नहीं करते, उन्हें हटा दीजिए।
अब माइनस करते हैं उन लोगों को, जो हमारे चाचा, मामा, काका, फूफी यानी जितने भी आपके रिश्तेदार हैं, उन्हें हटा दीजिए। क्योंकि ये तो रिलेशन लिस्ट में आएंगे, फ्रैंडलिस्ट में नहीं। अब प्लीज़ ये मत कहना कि क्या ताऊ दोस्त नहीं बन सकते या मम्मी भी तो बच्चों की दोस्त होती है। दोस्तों की कोई केटेगरी नहीं होती, दोस्त तो सिर्फ दोस्त होता है, छोटा-बड़ा नहीं होता। मगर वे महाशय ये भी बता दें कि क्या हम बॉयफ्रैंड से ब्रेकअप की बात मामा या ताऊ के साथ शेयर कर सकते हैं? या फिर फ्रैंडलिस्ट में फ्रैंड के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे अपने बॉस, मैनेजर वगैरहों के साथ हॉलीडे ट्रिप की बात कह सकते हैं। यकीन मानिए, अर्जेंट मीटिंग का हवाला देकर फौरन छुट्टियां कैंसल हो जाएंगी।
चलिए अब बताइए दोस्तों की संख्या कितनी बची, मेरे ख्याल से उंगलियों में गिने जा सकने वाली। है न!
एक बात बताइए, जब आप बहुत खुश होते हैं, तो किसको फोन लगाते हैं, या फिर जब आप बहुत उदास होते हैं, तो किससे बात करने को मन करता है? इन दोनों सवालों के जवाब में आपके अच्छे और सच्चे दोस्तों का नाम छिपा है।
ऑफिस में रहकर जिन्हें आपने एफबी की फ्रैंडलिस्ट में दर्ज किया था, उनके ऑफिस छोड़ देने के बाद भी क्या आप उनसे कनेक्ट हैं? ऐसे कितने लोग होंगे, जिनसे आप घर पर पूरे परिवार के साथ बैठे हुए भी बात कर सकते हैं? या ऐसे कितने लोग हैं, जो एफबी पर फ्रैंड होते हुए भी आप उनसे घर पहुंचने के बाद बात नहीं करते।
अब ज़रा उन लोगों के नाम बताइए, जिनसे आप दिन हो या रात किसी भी वक्त बात कर सकते हैं। जिनका नाम आपके परिवार का हर सदस्य जानता है। जिसके घर जाने या आपके घर आने में समय की कोई पाबंदी नहीं।
केवल एफबी की फ्रेंडलिस्ट में जुड़ जाने से कोई किसी का दोस्त नहीं बन जाता। दोस्त तो वो है, जो हर हाल में सामने नज़र आए। जो आपका बर्थडे याद रखते हुए भी भूल जाए और गाली खाने के लिए दूसरे दिन फोन लगाए। जिनके साथ हम अपनी अच्छी-बुरी बातें शेयर करते हैं।
एकदम सटीक बात है। कहने को तो हमारे पास हज़ारों की संख्या में दोस्त हैं आज की तारीख में। बताइए हैं न, चैक कीजिए अपनी फेसबुक फ्रैंडलिस्ट। किस-किस की लिस्ट हज़ार से ऊपर चली गई। अब ईमानदारी से देखा जाए, तो वाकई इस लिस्ट में फ्रैंड कहे जाने वाले लोग कितने हैं?
कोई दोस्त 16 का होगा, तो कोई 60 का भी होगा। अब जो फेसबुक की फ्रैंडलिस्ट में दर्ज है, वो फ्रैंड ही तो कहलाएगा, भाई, बंधु, चाचा, भतीजा थोड़े ही होगा। क्यों? सही कहा न!
एक गेम खेलते हैं, सिर्फ खेलेंगे, अप्लाई मत कीजिएगा वरना बहुतों को बुरा लग जाएगा। तो शुरू करते हैं फ्रैंडलिस्ट से फ्रैंडों की छंटाई। सबसे पहले हज़ारों की संख्या में फ्रैंडलिस्ट में दर्ज इन तथाकथित दोस्तों में से सचमुच दोस्त कहे जाने वाले लोगों की गिनती करते हैं। अब जो संख्या बची, उसमें से उन दोस्तों को अलग कर देते हैं जो हमारे ऑफिस में हैं क्योंकि ऑफिस की दोस्ती ऑफिस तक ही होती है, ये तो आप भी बेहतर जानते हैं। दिल से पूछिए एक बात, जब ऑफिस के किसी दोस्त का इंक्रीमेंट आपसे ज्यादा होता है, तो क्या आप उसकी खुशी में खुश होते हैं, या वो अपनी खुशी को भूलकर आपके दुख में शामिल होता है? दिल पर हाथ रखकर बताइएगा। खैर, जवाब आपको मिल गया होगा, अब आगे बढ़ते हैं।
बची हुई दोस्तों की संख्या में से उन दोस्तों को डिलिट कर दें, जो यूं तो आपसे कभी बात नहीं करते, हाल-चाल नहीं लेते, मगर एफबी पर संख्या बढ़ाने के लिए दर्ज हैं। मतलब जिन लोगों से आप रैग्युलरली बात नहीं करते, जिनके साथ सुख-दुख की बातें शेयर नहीं करते, उन्हें हटा दीजिए।
अब माइनस करते हैं उन लोगों को, जो हमारे चाचा, मामा, काका, फूफी यानी जितने भी आपके रिश्तेदार हैं, उन्हें हटा दीजिए। क्योंकि ये तो रिलेशन लिस्ट में आएंगे, फ्रैंडलिस्ट में नहीं। अब प्लीज़ ये मत कहना कि क्या ताऊ दोस्त नहीं बन सकते या मम्मी भी तो बच्चों की दोस्त होती है। दोस्तों की कोई केटेगरी नहीं होती, दोस्त तो सिर्फ दोस्त होता है, छोटा-बड़ा नहीं होता। मगर वे महाशय ये भी बता दें कि क्या हम बॉयफ्रैंड से ब्रेकअप की बात मामा या ताऊ के साथ शेयर कर सकते हैं? या फिर फ्रैंडलिस्ट में फ्रैंड के तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे अपने बॉस, मैनेजर वगैरहों के साथ हॉलीडे ट्रिप की बात कह सकते हैं। यकीन मानिए, अर्जेंट मीटिंग का हवाला देकर फौरन छुट्टियां कैंसल हो जाएंगी।
चलिए अब बताइए दोस्तों की संख्या कितनी बची, मेरे ख्याल से उंगलियों में गिने जा सकने वाली। है न!
एक बात बताइए, जब आप बहुत खुश होते हैं, तो किसको फोन लगाते हैं, या फिर जब आप बहुत उदास होते हैं, तो किससे बात करने को मन करता है? इन दोनों सवालों के जवाब में आपके अच्छे और सच्चे दोस्तों का नाम छिपा है।
ऑफिस में रहकर जिन्हें आपने एफबी की फ्रैंडलिस्ट में दर्ज किया था, उनके ऑफिस छोड़ देने के बाद भी क्या आप उनसे कनेक्ट हैं? ऐसे कितने लोग होंगे, जिनसे आप घर पर पूरे परिवार के साथ बैठे हुए भी बात कर सकते हैं? या ऐसे कितने लोग हैं, जो एफबी पर फ्रैंड होते हुए भी आप उनसे घर पहुंचने के बाद बात नहीं करते।
अब ज़रा उन लोगों के नाम बताइए, जिनसे आप दिन हो या रात किसी भी वक्त बात कर सकते हैं। जिनका नाम आपके परिवार का हर सदस्य जानता है। जिसके घर जाने या आपके घर आने में समय की कोई पाबंदी नहीं।
केवल एफबी की फ्रेंडलिस्ट में जुड़ जाने से कोई किसी का दोस्त नहीं बन जाता। दोस्त तो वो है, जो हर हाल में सामने नज़र आए। जो आपका बर्थडे याद रखते हुए भी भूल जाए और गाली खाने के लिए दूसरे दिन फोन लगाए। जिनके साथ हम अपनी अच्छी-बुरी बातें शेयर करते हैं।
दोस्त वह है, जो तब आपके साथ होता है, जब कोई आपके साथ नहीं होता, है न!
- प्रिया 'लय'
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