काश! ब्लैकबेरी और एप्पल मात्र फल रहते


करीब दो वर्ष पहले मेरे एक सहकर्मी और दोस्त दिल्ली शिफ्ट हो गए, उन्हें वहां अच्छे ओहदे और वजनदार वेतन पर प्रतिष्ठित लोगों के बीच जगह मिली। लंबे अंतराल के बाद जब हमारी बातचीत हुई, तो पहले मैं पूर्वधारणाओं से ग्रस्त थी कि नाम-दाम होने के कारण कहीं वे बदल न गए हों, मगर सोच के विपरीत वे पहले की ही तरह सौ प्रतिशत जमीन से जुड़े महसूस हुए। हर तरफ से सुविधा-संपन्न होने के बावजूद वे उसी तरह सादा जीवन बिता रहे हैं। आज भी उनके पास न महंगा मोबाइल है, न महंगी गाड़ी और न महंगे शौक। उनका मानना है कि जरूरतें जितनी कम होती हैं, ज़मीर उतना ही मजबूत होता है। वे छोटी जगह से जरूर हैं, पर सोच छोटी नहीं है। फिल्हाल वे ऑफिस की ओर से विदेश यात्रा पर जाने की तैयारी में लगे हैं।
बड़े-बुज़ुर्गों से सुनते आ रहे थे कि लोगों की पहचान उनके व्यवहार से होती है। लदा हुआ पेड़, झुका हुआ यानी जो जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा, गर्म जेब, हुनरमंद, योग्य होता है, उसे उतना ही स्वभाव से नर्म होना चाहिए। इसका जीता-जागता उदाहरण भी देख लिया। मगर इसके ठीक उलट आजकल कुछ लोगों को ब्रांडेड चीजों के पीछे भी भागते देखा जा सकता है। लोगों की पहचान के साथ ब्रांड शब्द जुड़ गया है। कोई, नॉर्मल जींस से पैपे जींस पहनकर अकड़ दिखाने लगा है, तो कोई चार हज़ार से चालीस हजार का मोबाइल रखकर तनकर चलने लगा है। आजकल तो बच्चे भी बड़ों को मात दे रहे हैं। 6 साल का बच्चा शादी में अपने अंकल से पूछ रहा था- आपके पास ब्लैकबेरी नहीं है क्या? वहीं मॉल में एक युवती दूसरी को समझा रही थी- फलां ब्रांड के जींस की फिटिंग अच्छी आती है। मुझे तो ब्रांडेड चीजों के अलावा कुछ जमता ही नहीं।
ब्रांड के पीछे दीवाने लोगों की वजह से ही चंद विक्रेताओं ने डुप्लीकेट की तिकड़म लगाई होगी। अब हर कोई तो पांच-सात हजार की जींस पहन नहीं सकता! ऐसे में ब्रांड की डुप्लीकेट चीजों से कम से कम दूर से तो ब्रांडेड दिखा ही जा सकता है। मतलब लोग असलियत छुपाने के पीछे भागने लगे। जो हैं, वो नहीं दिखना चाहते और जो वो दिखना चाहते हैं, वो उनके बजट में नहीं होता।
बचपन में मामाजी भाइयों को समझाते थे कि पॉलिश किए जूते पहनकर ही देहरी पार किया करो। कपड़े ढंग से इस्त्री किए, शर्ट की कॉलर कड़क प्रेस, बाल करीने से जमे हुए, पीठ सीधी और गर्दन ऊंची करके घमंड से नहीं आत्मविश्वास के साथ घर से निकला करो। और दिमाग में लेकर चलो कि खुशी के लिए काम करोगे, तो खुशी शायद न मिले, लेकिन खुश होकर काम करोगे, तो खुशी और सफलता दोनों घर लेकर लौटोगे।
अब चार पहिया होना बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात हो गई है किस ब्रांड की कार है? शाहरुख जिसका विज्ञापन करता है, वह वाली गाड़ी या रणबीर जिसकी सलाह देता है वह कार। ब्रांड के पीछे भागती दुनिया में जरूरत के मायने बदलते जा रहे हैं। पहले चीजें जरूरत के हिसाब से खरीदी जाती थीं, अब जरूरतों पर स्टेटस का जामा चढ़ गया है। जि़ंदगी कितनी आसान और ज्यादा रोमांचक होती अगर एप्पल और ब्लैकबेरी केवल फल होते।
मैंने अक्सर बच्चों को भगवान से उनके कद से भी ज्यादा इच्छाओं की मांग करते देखा है। काश, बड़े उस लम्हे बच्चों को यह समझा दें कि भगवान से कुछ भी मांगने के बजाए खुद पर विश्वास रखें, क्योंकि ऊपरवाला वो नहीं देता, जो आपको अच्छा लगता है, बल्कि वो देता है, जो आपके लिए अच्छा होता है।
ब्रांडेड चीजों के लिए एक-दूसरे की होड़ में रोते लोग जि़ंदगी का फलसफा ही भुला बैठे हैं कि जब आप अपनी मुस्कराहट के मालिक खुद होते हैं, तो दुनिया का कोई भी बंदा आपको रुला नहीं सकता। आटे में पडऩे वाला कोई भी आयोडीन नमक सेहत बना सकता है, मगर देश का नमक खाते हैं, कहने में उन्हें जो गर्व महसूस होता है, बस वह अनुभूति ही काफी होती है। लेकिन अनुभूतियों को दिल से जोडऩा भी तो जरूरी है, नहीं तो सुख घर में आकर लौट भी जाएगा और हम उसे भोग भी नहीं पाएंगे।
खैर, चप्पल से लेकर एप्पल तक सभी में होड़ लगी है ब्रांड की, मगर किसी की समझाइश कहती है कि आप जैसे हैं, वैसे ही रहें, वही आप पर सूट करता है। बनावटीपन से असल पहचान कहीं खो सी जाती है।
- प्रिया 'लय'

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