दिखावे की दुनिया और दुनिया में दिखावा
छुरी को दाएं हाथ में पकड़ो, बाएं में नहीं। फलां चीज को कांटे पर इस तरह फंसाकर खाते हैं। खाना डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाया जाता है, आलथी-पालथी मारकर गंवार लोग खाते हैं। हाथ से दाल-चावल को खाना गंवारूपन है, उस पर उंगलियों को चाटकर खाना और आवाज़ करके खाना तो अनपढ़ों की निशानी है। ये सारी हरकतें मिडिल क्लास हंै, अच्छी सोसायटी में उठना-बैठना है, तो रहन-सहन के तौर-तरीके सीखने होंगे। कुछ तो अच्छे लक्षण लाओ अपने अंदर। बालों में तेल डालकर मत रखो, कंडीशनर इस्तेमाल करो। चश्मा नहीं, लैंस लगाया करो। स्टाइल में चलो। वो लोग देखो, कैसे रहते हैं, इसलिए तो सब उनके आस-पास घूमते हैं। ज्ञान-वान तो दूसरी और तीसरी पायदान पर है। याद रखो, जो दिखता है, वो ही बिकता है।
उफ! बहुत सारे नियम-कायदे, ताने और बाने भी हैं इस मैनर्स सिखाती दुनिया में, कितने सारे फंडे जि़ंदगी जीने के। अपनी तरह से कुछ मत करो, दूसरों को देखकर चलो। एक-दूसरे से तुलना करते हो। मगर क्या सचमुच अच्छी जि़ंदगी जीने के सिर्फ यही फंडे हैं? अब यह देखिए -
तुम बड़े ओहदे पर काम करते हो, बड़ी गाड़ी से आते हो। छोटी गाडिय़ों से आने वाले और तुम से नीचे पर काम करने वालों के साथ ज्यादा उठना-बैठना ठीक नहीं। लोग क्या कहेंगे कि इसका तो कोई स्टैंटर्ड ही नहीं है। अपने और उनके बीच एक दूरी बनाकर रखो। पता है, फलाने की पत्नी कलेक्टर है, तो ढिकाना का पति विदेश में नौकरी करता है।
देखा, दुनिया इसी में उलझकर रह गई है। वे लोग दूसरों को खुलकर जीना सिखा रहे हैं, जो खुलकर हंसना भी अपराध समझते हैं। शायद इसीलिए अब लोगों के दो चेहरे होने लगे हैं।
आगे दृश्य कुछ ऐसा था कि लंबी, छरहरी, स्टायलिश वेशभूषा में लड़कियों की लाइन लगी थी, तो वहीं एक झुंड में तकरीबन एकसाथ बैठी थीं सामान्य कद-काठी, पिनअप दुपट्टे के साथ कुछ बालाएं। जो खूबसूरती के बीच खुद को असहज महसूस कर रही थीं और कुछ उन्हें वैसा महसूस करवाया भी जा रहा था।
लोगों की एक अजीब मानसिकता से आजकल हर किसी को दो-चार होना पड़ रहा है। सामान्य तरीके से रहना, निम्न वर्ग का होना एक बीमारी की तरह लगता है एक वर्ग विशेष के लोगों को। भले ही लोगों की नजर में आज खूबसूरत होना अहम हो मगर अहं का न होना भी तो खूबसूरती ही है। मगर बुद्धि तो गई एक तरफ, अब तौर-तरीका, रहन-सहन ही व्यक्ति की पहचान बन गया। सोचकर देखिए बिना आवाज़ के सेबफल खाया जा सकता है भला और पापड़ की तो तासीर ही आवाज करना है, फिर क्या करें? महज एटीकेट्स की आड़ में दिखावे की दुनिया में वास्तविकता को ढूंढना बहुत मुश्किल हो गया है। टेबल मैनर्स सीखती युवती छुरी-कांटे से केले को बड़े आराम से छील रही थी। उसके बाद केले के धीरे-धीरे टुकड़े करके होंठों को स्टाइल में घुमा-घुमाकर खाने की उम्दा कोशिश, कि अचानक केले का टुकड़ा सामने बैठी मोटी आंटी को जा लगा। आगे आप खुद समझ जाइए। मन किया कोई समझा दे उसे कि केले को तो बख्श दो।
भेदभाव का एक नया तरीका खोज निकाला लोगों ने। लोगों की सोच कि पैसा कमा लो, रिश्ते अपने आप बन जाएंगे। ओहदा बढ़ा लो, लोग आस-पास अपने आप बढ़ जाएंगे। दिखावे का प्यार, जो पैसे और पद के आगे समय के साथ फीका पड़ जाता है। झूठमूठ के रिश्ते, मतलब पर भाई और लूटते रहो कमाई।
लेकिन कोई कितना भी भेड़चाल में चलकर देख ले या दूसरों के लिए खुद को बदल ले। आपको तौर-तरीके सिखाए या बहती धारा में बहाए, मगर अंत में तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है क्योंकि वास्तव में ज्ञान और व्यवहार ही आपको आपकी पहचान दिलाता है। है न!
- प्रिया 'लय'
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