रिश्ते को मजबूती देती समझ का दायरा
सास-बहू से इतर शुरू हुए एक नए धारावाहिक पर जाकर रिमोट रुक गया। भारी-भारी लदे हुए गहने, जरी-गोटे वाली साडिय़ां, आधी मांग तक भरे सिंदूर और उस पर खलनायिकाओं के आए दिन नए दांव-पेंच को भुलाते हुए पति-पत्नी के रिश्तों की एक खूबसूरत कहानी ने प्रभावित किया। पहली ही कड़ी ने मियां-बीवी को आपस में समझने का बहुत अच्छा मौका दिया।
कड़ी में हुआ कुछ इस तरह कि...... सुबह ऑफिस के लिए हंसते-हंसते विदा करती पत्नी की तारीफ में कहने के लिए पति को शब्द नहीं मिल रहे थे और शाम को किसी बात पर खफा हो जाने पर उसी पति ने अपनी पत्नी को काफी बुरा-भला कह दिया- 'तुम बदल गई हो, वो नहीं हो जिससे मैंने प्यार किया... शादी की!Ó
अभी बात गले से नीचे नहीं उतरी थी कि थोड़ी ही देर बाद वही पति आत्मग्लानि से भरा नजर आया। उसे अहसास हो गया था कि उसने पत्नी पर गलत गुस्सा किया है। दरअसल स्त्री ने पत्नी का दायित्व निभाने से ज्यादा जरूरी मां का फर्ज निभाना समझा। बस, पति समझ गया कि उसकी प्रेमिका अब पत्नी ही नहीं, बल्कि मां भी है। जब असल बात पति को समझ आई, तो उसने कुछ ऐसा कह दिया, जिसमें किसी भी पति-पत्नी के रिश्ते को और भी मजबूत करने का सार छुपा था।
पति के शब्द थे- 'किसी पुरुष का प्यार उसकी प्रेमिका या पत्नी के लिए भले ही कुछ सालों बाद कम हो जाए, मगर अपने बच्चों की मां के लिए उसका प्यार कभी कम नहीं हो सकता, बल्कि साल-दर-साल बढ़ता ही जाता है।Ó
एक पति की ऐसी खूबसूरत सोच पर सचमुच नाज़ हो आया। शायद तभी लोग कहते हैं कि बच्चे पति-पत्नी के रिश्ते की डोर को और मजबूत कर देते हैं। पति-पत्नी में अबोला हो, तो बच्चे उस चुप्पी को तोड़ देते हैं। पत्नी मां बनने के बाद बच्चों से ज्यादा जुड़ जाती है और पति, पिता बनते साथ ही अपनी पत्नी से गहरे जुड़ जाता है। समर्पण और त्याग जैसी भावनाओं का अहसास माता-पिता बनने के बाद ही चलता है, जब अपने लिए साड़ी खरीदने और बेटी के लिए बैडमिंटन का रैकेट खरीदने की जद्दोजहद में साड़ी रैकेट से हार जाती है।
खुद की खूबियों पर इतराने वाला पुरुष पिता बनने के बाद बच्चों की योग्यताओं पर मिलने वाली तारीफों से लदे हुए पेड़ की तरह झुकना सीख जाता है। स्त्री मां बनकर एक बार फिर परीक्षाओं के दौर से गुजरती है। बच्चे जब अपने संस्कारों के लिए तारीफें हासिल करते हैं, तो उनके पीछे गुरु मां ही असल में बधाई की पात्र होती है।
एक बहुत खूबसूरत उदाहरण देखने को मिल रहा है। दो साल पहले एक खूबसूरत जोड़ा पड़ोस में किराए से रहने आया था। उनकी अरेंज मैरिज हुई है। जल्द ही हमारी मोटी आंटी ने उस जोड़े का नामकरण भी कर दिया था- 36 का आंकड़ा। ये उनका मकान नंबर था - 36। असल में, कभी-कभी उस घर से झगड़े की आवाज़ें खिड़की से सीधे अंदर आ जाती थीं, तो वे मजाक में कहतीं - मकान नंबर 36 है, इसलिए दोनों में छत्तीस का आंकड़ा ही रहता है। खैर, ये तो एक भ्रम है। ऐसा कुछ भी नहीं था उनमें। बाद में उन्होंने ही इस भ्रम को तोड़ दिया। हालांकि अभी दोनों एक-दूसरे को ठीक तरह से समझने की कोशिश कर ही रहे थे कि अचानक खुशखबरी मिली कि वे माता-पिता बनने वाले हैं। तब से पति की देखभाल पत्नी के लिए जरूरत से ज्यादा बढ़ गई और पत्नी का जुड़ाव पति से पहले से कई गुना ज्यादा हो गया। नन्हा खबरी दोनों के रिश्ते की प्रगाढ़ता की खबर लाया था। बात-बात पर होने वाला झगड़ा, छोटी-छोटी सलाहों में बदल गया। एक-दूसरे की मर्जी के बिना दोनों कोई काम नहीं करते। दोनों ही एक-दूसरे की पसंद का भी ख्याल रखते, चाहे वह सुबह पति की पसंद की तरकारी बनाने की बात हो या लौटते वक्त पत्नी के लिए गुड़पट्टी लाने की खुशी। पत्नी पूछती - कितने बजे आओगे? तो पति पूछता - आते वक्त तुम्हारे लिए क्या लेकर आऊं? वगैरह-वगैरह।
आने से पहले ही छोटे मेहमान ने दोनों को कभी न टूटने वाले बंधन में बांध दिया। 36 का आंकड़ा विपरीत हो चुका था। अब वे पति-पत्नी से एक प्यारी-सी एंजिल के मम्मी-डैडी बन गए हैं। सचमुच संतान सेतु होती हैं, जो नदी के दो किनारों को भी जोड़ देती हैं। आपसी गलतफहमियां दूर कर देती हैं। समझ के दायरे को विस्तार देती हैं और अहसास करवाती हैं कि प्यार तब भी था, प्यार अब भी है....।
- प्रिया 'लय'
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