समय को नहीं, खुद को करें व्यवस्थित
अभी तो मेरे पास बिल्कुल भी टाइम नहीं है... इस वक्त तो टाइम नहीं है बाद में मिलते हैं, फिलहाल बहुत बिजी चल रही हंू...यार टाइम नहीं मिल रहा, वगैरह-वगैरह...कब तक चलेंगे ये बहाने, अब तो इनसे पार पाइए....
आपने बहुत अक्सर ऐसे जुमले सुने होंगे, या यूं कहें आप भी ऐसे वाक्य किसी न किसी से कहते होंगे। दरअसल समस्या घड़ी के कांटों में नहीं है, बल्कि हमारी ही जीवनचर्या में कहीं न कहीं खोट है, जिसे हम समय की मार कहकर सीधे-सीधे बच निकलते हैं।
आज के दौर में किसी के पास भी समय नहीं है, मगर समय निकाला जरूर जा सकता है। अब इस बात को आप कतई टाइम मैनेजमेंट से न जोड़ें। कुछ देर के लिए मैनेजमेंट गुरुओं के टाइम मैनेजमेंट पर पढ़ाए पाठ को भूलकर खुद पर ध्यान केंद्रित कीजिए और सेल्फ मैनेजमेंट की तरफ रुख कीजिए। समय की टिक-टिक को तो बांधा नहीं जा सकता, मगर खुद को तो व्यवस्थित किया जा सकता है न! इसी का नाम है - सेल्फ मैनेजमेंट, जिसका मुख्य बिंदु आप स्वयं हैं, इसलिए खुद को व्यस्थित करने का प्रयास करें।
बच्चे को स्कूल प्रोजेक्ट में आपकी मदद चाहिए, आपने कहा अभी टाइम नहीं है बाद में मदद करूंगी। दादी की आखिरी इच्छा थी बद्रीनाथ जाने की, टाइम नहीं था, बच्चे ले नहीं जा पाए।
पति के पास बीवी के लिए समय नहीं है, वर्किंग मदर के पास बच्चों के लिए समय नहीं है और बच्चे हैं कि बुजुर्गों को समय नहीं दे पा रहे, ... वाह रे ऊपरवाले तेरी माया, समय के फेर में ये कैसा फंसाया।
85 वर्षीय नानीमां लंबे समय से बीमार चल रही थीं, आखिरी इच्छा थी बैंगलूरू में रह रहे अपने नाती का एक बार मुंह देख लें। आज नहीं कल, कल नहीं परसों और इस तरह परसों हो गए बरसों। नाती व्यस्त शेड्यूल से समय नहीं निकाला पाया और आया भी तो तब, जब नानीमां का उठावना हो रहा था। भगवान नानीमां की आत्मा को शांति दे।
जब आप जानती हैं कि सुबह-सुबह जल्दी होती है, तो फिर क्या जरूरत है पड़ोस वाली आंटी से आधा घंटे खड़े होकर बतियाने की। अगर जरूरी भी था, तो बातों के साथ-साथ हाथ का काम भी निपटाती चलतीं। वैसे सच पूछें तो किचन की छोटी-मोटी तैयारी तो रात में भी करके रखी जा सकती है। अब तो ठंडों के दिन हैं, रातें बड़ी और दिन छोटे। इसलिए ज्यादातर काम रात में ही करके रखना चाहिए, ताकि सुबह आसानी हो। अगर आप वर्किंग हैं, तब तो ये और भी अहम हो जाता है।
ऑफिस का एक दृश्य देखिए - मि. शर्मा सुबह से जो ऑफिस में प्रवेश करते हैं, रात 9 बजे तक कंप्यूटर कीबोर्ड में खटर-पटर करने में लगे ही रहते हैं। भगवान जाने क्या काम करते हैं। शायद उन्हें लगता है कि इस तरह वे दूसरों के सामने अपना इंप्रेशन जमा पाएंगे कि वाह, शर्माजी तो बहुत काम करते हैं। कुछ लोग प्रिटेंट करते हैं कि वे काम करते हैं, तो कुछ काम को काम की ही तरह करते हैं। शर्माजी ने इंप्रेशन के चक्कर में डिप्रेशन को घर बुला लिया और बीपी के शिकार हो गए। समय पर काम निपटाने के बाद भी घंटों बैठे रहकर दिखाना कि भई बहुत काम करते हैं, समझदारी नहीं बेवकूफी है। वही समय अपनों को देकर उन्हें खुश कर सकते हैं।
मैं कोई इमोशनल अत्याचार नहीं कर रही हूं आप पर, पर जीवन की सच्चाई यही है, किसने देखा कल...। इसलिए आज से ही नहीं, बल्कि अभी से खुद को व्यवस्थित करके अपने बहुमूल्य समय की बचत करें।
- प्रिया 'लय'
अभी तो मेरे पास बिल्कुल भी टाइम नहीं है... इस वक्त तो टाइम नहीं है बाद में मिलते हैं, फिलहाल बहुत बिजी चल रही हंू...यार टाइम नहीं मिल रहा, वगैरह-वगैरह...कब तक चलेंगे ये बहाने, अब तो इनसे पार पाइए....
आपने बहुत अक्सर ऐसे जुमले सुने होंगे, या यूं कहें आप भी ऐसे वाक्य किसी न किसी से कहते होंगे। दरअसल समस्या घड़ी के कांटों में नहीं है, बल्कि हमारी ही जीवनचर्या में कहीं न कहीं खोट है, जिसे हम समय की मार कहकर सीधे-सीधे बच निकलते हैं।
आज के दौर में किसी के पास भी समय नहीं है, मगर समय निकाला जरूर जा सकता है। अब इस बात को आप कतई टाइम मैनेजमेंट से न जोड़ें। कुछ देर के लिए मैनेजमेंट गुरुओं के टाइम मैनेजमेंट पर पढ़ाए पाठ को भूलकर खुद पर ध्यान केंद्रित कीजिए और सेल्फ मैनेजमेंट की तरफ रुख कीजिए। समय की टिक-टिक को तो बांधा नहीं जा सकता, मगर खुद को तो व्यवस्थित किया जा सकता है न! इसी का नाम है - सेल्फ मैनेजमेंट, जिसका मुख्य बिंदु आप स्वयं हैं, इसलिए खुद को व्यस्थित करने का प्रयास करें।
बच्चे को स्कूल प्रोजेक्ट में आपकी मदद चाहिए, आपने कहा अभी टाइम नहीं है बाद में मदद करूंगी। दादी की आखिरी इच्छा थी बद्रीनाथ जाने की, टाइम नहीं था, बच्चे ले नहीं जा पाए।
पति के पास बीवी के लिए समय नहीं है, वर्किंग मदर के पास बच्चों के लिए समय नहीं है और बच्चे हैं कि बुजुर्गों को समय नहीं दे पा रहे, ... वाह रे ऊपरवाले तेरी माया, समय के फेर में ये कैसा फंसाया।
85 वर्षीय नानीमां लंबे समय से बीमार चल रही थीं, आखिरी इच्छा थी बैंगलूरू में रह रहे अपने नाती का एक बार मुंह देख लें। आज नहीं कल, कल नहीं परसों और इस तरह परसों हो गए बरसों। नाती व्यस्त शेड्यूल से समय नहीं निकाला पाया और आया भी तो तब, जब नानीमां का उठावना हो रहा था। भगवान नानीमां की आत्मा को शांति दे।
जब आप जानती हैं कि सुबह-सुबह जल्दी होती है, तो फिर क्या जरूरत है पड़ोस वाली आंटी से आधा घंटे खड़े होकर बतियाने की। अगर जरूरी भी था, तो बातों के साथ-साथ हाथ का काम भी निपटाती चलतीं। वैसे सच पूछें तो किचन की छोटी-मोटी तैयारी तो रात में भी करके रखी जा सकती है। अब तो ठंडों के दिन हैं, रातें बड़ी और दिन छोटे। इसलिए ज्यादातर काम रात में ही करके रखना चाहिए, ताकि सुबह आसानी हो। अगर आप वर्किंग हैं, तब तो ये और भी अहम हो जाता है।
ऑफिस का एक दृश्य देखिए - मि. शर्मा सुबह से जो ऑफिस में प्रवेश करते हैं, रात 9 बजे तक कंप्यूटर कीबोर्ड में खटर-पटर करने में लगे ही रहते हैं। भगवान जाने क्या काम करते हैं। शायद उन्हें लगता है कि इस तरह वे दूसरों के सामने अपना इंप्रेशन जमा पाएंगे कि वाह, शर्माजी तो बहुत काम करते हैं। कुछ लोग प्रिटेंट करते हैं कि वे काम करते हैं, तो कुछ काम को काम की ही तरह करते हैं। शर्माजी ने इंप्रेशन के चक्कर में डिप्रेशन को घर बुला लिया और बीपी के शिकार हो गए। समय पर काम निपटाने के बाद भी घंटों बैठे रहकर दिखाना कि भई बहुत काम करते हैं, समझदारी नहीं बेवकूफी है। वही समय अपनों को देकर उन्हें खुश कर सकते हैं।
मैं कोई इमोशनल अत्याचार नहीं कर रही हूं आप पर, पर जीवन की सच्चाई यही है, किसने देखा कल...। इसलिए आज से ही नहीं, बल्कि अभी से खुद को व्यवस्थित करके अपने बहुमूल्य समय की बचत करें।
- प्रिया 'लय'
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