एक घर में जाता है, दूसरा घर से जाता है
आज ऑफिस आते वक्त एक खूबसूरत घर के सामने से निकलना हुआ, जहां कुछ फंक्शन चल रहा था, माहौल से और घर की सजावट से साफ पता चल रहा था कि कार्यक्रम गृहप्रवेश का था। मैंने अपने दोस्त से कहा, कितने लकी हैं, जो खुद के घर में प्रवेश करने जा रहे हैं। मगर मेरे दोस्त की नजर गृहप्रवेश कर रहे परिवार की जगह उन लोगों पर थी, जो ईंट के बने एक छोटे से अस्थाई घर से अपना बोरिया-बिस्तर बांध रहे थे। उसने मेरे सवाल के जवाब में जो कहा, वो सच में बहुत गहरी सोच थी। उसका कहना था- कितने असमर्थ हैं ये लोग, जिन्होंने दिन-रात मेहनत, घर की चौकीदारी करके किसी और के लिए ये खूबसूरत आशियाना बनाया, और आज जब घर के मालिक अपना गृहप्रवेश कर रहे हैं, तो वे बेघर हो रहे हैं। शायद यही उनकी नियति है। भला दूसरों के घर बनाने वालों का अपना कोई ठिकाना भी हो सकता है!
वहां से निकलने के बाद मेरे दिमाग में दोस्त की वही बातें कौंधती रहीं। मुझे अचानक वो मजदूर परिवार याद हो आया, जो कभी हमारे घर के सामने बन रहे एक मकान में काम कर करने आया था। सास-ससुर, पति-पत्नी और उनके तीन बच्चे। सारे के सारे मकान का काम करने के अलावा घर की रखवाली का काम भी किया करते थे, इसलिए बन रहे मकान के बाहर ही एक छोटा-सा कच्चा ईंटों का घर बना लिया था। लगभग चलती सड़क के बिल्कुल किनारे बने बक्सेनुमा उस घर में वे सभी रहते थे। एकाध बार आते-जाते उन्हें देखा था। एक दिन उनके बच्चों को बीच सड़क में लोट खाते देखा, तो डांट-डपट कर अंदर भगाया। इतने में साड़ी की आड़ को चीरते हुए उनकी मां बाहर आई और हल्की-फुल्की बातचीत के बाद वह मुझसे झाड़ू-बर्तन का काम मांगने लगी। मुझे भी जरूरत थी, इसलिए उसे काम पर रख लिया। जब तक वह घर बनता रहा, वह महिला भी मेरे घर पर काम करती रही। उसके काम से मुझे कोई शिकायत नहीं थी, पर एक बात जो मुझे लगातार परेशान कर रही थी। महीने की पहली तारीख को जब हिसाब करने की बारी आती, तो महिला की जगह उसकी सास आती। एक-दो बार मैंने ऐतराज भी किया, मगर उसकी सास अकड़कर कहती- वो भी मुझे ही देगी। जब महिला को यह बात बताई, तो वह कुछ नहीं बोली- बस रोने लगी।
एक दिन महिला मुझे कहने आई कि वह अगले दिन से काम पर नहीं आएगी। मैंने पूछा- अचानक क्या हो गया। तो उसने बताया अब उन्हें अपना डेरा कहीं और ले जाना है। जिस मकान के लिए ठेकेदार उन्हें लेकर आया था, वह पूरा हो गया। मैं क्या कर सकती थी, उसका हिसाब कर दिया बस।
शाम को ऑफिस से लौटते वक्त देखा उसके घर के पास बहुत भीड़ लगी है। मैं भी उत्सुकतावश वहां पहुंच गई, देखा उसकी बड़ी बच्ची खून से लथपथ थी। जिस बात का डर था, वही हुआ। एक तेज रफ्तार कार ने बच्ची को धक्का मारकर लहूलुहान कर दिया। कारवाला तो भाग ही गया, उसके इलाज के लिए न तो ठेकेदार ने कोई पैसा जेब से निकाला, न ही मकान का काम करवा रहे उन लोगों ने कोई मदद की। जैसे-तैसे हम सभी आस-पड़ोस के लोगों ने पैसे जुटाकर बच्ची को डॉक्टर को दिखाकर मरहम-पट्टी करवाई।
अगले दिन जब उसके घर के सामने से गुजरी, तो ईंटों से बना वह घर टूट चुका था। शायद वे घायल बच्ची को लेकर नए काम की तलाश में निकल चुके थे, ताकि जल्द ही फिर से छत की व्यवस्था हो पाए।
सच कहा था दोस्त ने, जब कोई अपने घर में जा रहा होता है, तो दूसरी ओर कोई और घर से जा रहा होता है। दोस्त ने उस खुशनुमा माहौल में भी किसी की तकलीफों का अंदाज़ा लगा लिया था।
- प्रिया 'लय'
Comments
Post a Comment