वो गर्मियों की छुट्टियां और आम-अमरूद के पेड़
कुछ साल पहले भव्य मकान बनाने के चलते ननिहाल में वर्षों से विराजमान आम का पेड़ बलि की बेदी चढ़ गया। यह पहला सदमा नहीं था जब कोई फलता-फूलता वृक्ष आंगन से अपनी विदाई ले रहा था। इससे पहले अमरूद के झाड़ ने अपना बलिदान दिया था। एक के जाने के बाद दूसरे का जाना बची-खुची पूंजी के खत्म होने जैसा था। शुक्र है नानी के आखिरी वक्त तक ये पेड़ उनके सामने कद्दावर की तरह खड़े थे।
मामाजी ने बड़े दुलार से अमिया और अमरूद के दोनों वृक्षों को अपने आंगन में रोपा था। हम गर्मी की छुट्टियों में मामाजी के घर आते, तो निगाहें हमेशा दोनों पेड़ों में लगे फल की तरफ होतीं। 'कच्चे मत तोडऩाÓ मामी हमारी नीयत भांपते ही कड़ी पाबंदी लगा देतीं।
बचपन से मीठे-मीठे आम देने वाले इस वृक्ष से बहुत सारी मीठी यादें भी जुड़ी हैं। नानी फल आने के बाद हमें ताजा-ताजा अमिया का अचार खिलाती थीं, जिसका स्वाद आज भी जीभ को जस का तस है।
गर्मियों में आम के पेड़ की छाया में नानी ने सूपे भर-भर के सैवंयां हाथ से तोड़ी हैं, जिनके स्वाद तो क्या बनावट की तुलना तक बाजार की कोई सैवंया कंपनी नहीं कर सकती। अमरूद के पेड़ के नीचे सूखते थे मूंग-चने के पापड़, जिन्हें पलटने और देख-रेख की जिम्मेदारी हम बच्चों को दी जाती थी।
उन दोनों वृक्षों में लगने वाले फलों की बात ही कुछ और थी। सिर्फ हमें ही नहीं, आस-पास के बच्चों की भी नज़र आम-अमरूद पर लगी होती थी। दोपहर में नानी की नींद लगते ही बच्चे पेड़ों पर झूम जाते। एक पेड़ पर चढ़ता, तो दो-तीन नीचे खड़े होकर फलों के टपकने का इंतज़ार करते। एक राज़ की बात, नानी को इस बात का कभी पता नहीं लगा कि उनकी नींद की खबर हम ही बच्चों तक पहुंचाते थे, इसके एवज में एक-दो फल कलटी में हमें भी मिल जाते।
नानी हमेशा कहती थीं कि ये पेड़ किसी बुजुर्ग से कम नहीं होते। खाने को मीठे फल देते हैं और धूप में ठंडी छाया। नानी की कहानियों में पेड़-पौधों का एक अहम स्थान होता था। मुझे आज भी धौरा-पीरा की वह कहानी याद है, जिसमें एक सेठ हुआ करता था और एक सेठानी। चूंकि सेठानी की कोई ननद या जेठ नहीं था, तो उसने बेरी के झाड़ को अपनी ननद बनाया था और आम के पेड़ को अपना जेठ माना था। सेठानी ताउम्र जेठ से परदा करती रहीं और ननद की सेवा।
पुरानी कहानियों में पेड़-पौधों का कितना महत्व था, ये नानी की कहानियों में साफ ज़ाहिर होता था। हर तीज-त्योहारों पर सबसे पहले उन वृक्षों की पूजा होती थी। इसके अलावा रोज़ उन पेड़ों के नीचे दीपक रखने का नियम नानी कभी नहीं भूलीं।
गर्मियों में तो सभी शाम ढलकने का इंतज़ार ही करते थे। शाम को पेड़ों की शाखाओं से झूमना हम बच्चों का प्रिय शगल हुआ करता था। लेकिन रात को पेड़ों की पत्तियों को हाथ लगाना भी मना था। नानी की चेतावनी थी कि रात को पेड़ों को परेशान न किया जाए। पत्तियों के झुके चेहरे देखकर नानी समझातीं, 'देखो, अब पेड़ सो रहे हैं। इन्हें छुओगे तो वे जाग जाएंगे। और किसी को नींद से जगाना अच्छी बात नहीं।Ó नानी की सिखाई बात हम आज तक याद रखे हुए हैं।
अब न नानी हैं, न वे आम-अमरूद के पेड़ और न पहले जैसी गर्मी की छुट्टियां। बच्चे बिना पेड़ों की छाया में अपना बचपन बिता रहे हैं। घरों से अपना अस्तित्व मिटाकर हाई-फाई पार्क में जाकर बसना उन वृक्षों के लिए वैसा ही है, जैसे बोनसाई को शोपीस की तरह घर के एक कोना में जगह देना। लाइफ-स्टाइल के चलते लोग घास भी नकली लगवा रहे हैं, पेड़ों को क्या जगह देंगे।
प्रिया 'लय'
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