तुम यूं बिना कुछ कहे क्यों चली गईं


दिन 13 मई, वक्त शाम का, जगह कानपुर। खबर आई कि खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली। कानपुर से यूं तो मेरा कोई सीधा संबंध नहीं है। मेरा वहां कोई घरोबा नहीं था, मगर फिर भी एक लगाव तो था, जो अब नहीं रहा, बल्कि इस शहर के नाम से दूरी जरूरी बन गई है। कोई रहता था मेरा, जिससे न तो खून का रिश्ता था, न रिश्तेदारी। 14 जून सुबह का वक्त, खाने की तैयारियों में लगी मैं दौड़-भाग कर रही थी कि अचानक मोबाइल बजा। आवाज सहेली की थी। एक मिनट तक तो वो रोती रही, मैं समझ नहीं पाई, बस उसे चुप कराने में लगी थी। धीरे-धीरे जब उसने खुद को संभाला, तो बस इतना ही बोली- संध्या ने 13 मई को आत्महत्या कर ली।
मैं स्तब्ध। न कुछ बोलते बना, न कुछ सुनते। कहकर उसने फोन काट दिया। मैं किचन से निकली और खुद को ये यकीन दिलाने लगी कि हो सकता है मैंने गलत सुना हो। अभी दिसंबर में ही तो मिली थी उससे। हम दस सालों बाद मिले, लेकिन उसी गर्मजोशी से, जैसे बचपन में रोज स्कूल में मिलाकर करते थे। फिर अचानक, क्यों, कैसे?
काश, उसने एक बार अपने जीवन में चल रही परेशानियों के बारे में जि़क्र किया होता, तो शायद हम सारे दोस्त मिलकर उसका समाधान निकाल पाते। समस्या को अगर जड़ से खत्म न कर सकते होते, तो कम से कम समस्या को कितनी भी न बढऩे देते कि नतीजे में हमें उसे खोना पड़ता।
उसके इस निर्णय से न सिर्फ हमारी मित्र मंडली हिल चुकी है, बल्कि मुझे उन दो मासूमों के बारे में सोच-सोचकर दुख हो रहा है।
काश, इतना बड़ा फैसला लेने से पहले तुमने एक बार ये सोचा होता है कि तुम्हारे जाने के बाद उन दो छोटे-छोटे मासूम बच्चों का क्या होगा? उन्हें तुम किसके भरोसे छोड़ गई हो?
तुम कहां चली गईं यार, एक बार आकर देख। तुझे अब भले हमारी जरूरत न हो, पर हमें तेरी जरूरत पहले भी थी और हमेशा रहेगी।
बात करने से ही बात बनती है यारो, हमने तो अपना दोस्त खो दिया, मगर ऐसे बहुत से लोग हैं, जिनके दोस्त, रिश्तेदार या कोई ऐसा शख्स जिनके वे नजदीक हैं, आस-पास हैं। अगर परेशान देखें, तो उसे उलझन से निकालने की कोशिश करें, शायद आपकी एक सलाह, सिर पर रखा प्यार-भरा हाथ उसकी जि़ंदगी बचा ले।

- प्रिया 'लय'

Comments

Popular posts from this blog