सच है! हर एक फ्रैंड जरूरी होता है


दोस्त और प्यार में एक बड़ा अंतर - प्यार कहता है- अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मैं जी नहीं पाऊंगा, जबकि दोस्त कहता है - कि पागल, मेरे रहते तुझे कुछ हो नहीं सकता। प्यार की जगह दोस्त नहीं ले सकते और दोस्त की जगह प्यार नहीं ले सकता। रात के 2 बज रहे थे और नींद आंखों से दूर थी। मन उदास, दिमाग में उलझन और कशमकश, और तभी अचानक ये मैसेज, मैसेज के अंत में लिखा था- तुम्हारी हिडंबा। मैसेज बहुत पुरानी दोस्त का था, बरसों पहले मामूली सी बात पर लंबी नाक के चलते उससे आगे होकर कभी बात नहीं की। मगर ज़ेहन में वह हमेशा रही।
वो दोस्त है, सच्ची दोस्त, यह उसने साबित कर दिया। सारे गिले-शिकवे भुलाकर सालों बाद मेरा नंबर जुगाड़कर आखिर उसने ही पहल की। हिडंबा (असली नाम कुछ और), मेरी दोस्त। उसकी कद-काठी के चलते हम उसे मजाक में इसी नाम से पुकारते थे।
मैसेज पढऩे के बाद मैंने तेवर भुलाकर, गुस्से को जेब में रखकर रात को 2 बजे ही हिडंबा को फोन लगाया, पूरी रिंग जाने के बाद भी उसने फोन नहीं उठाया। इस बार मुझे गुस्सा नहीं आया, दोस्त के प्रति सकारात्मक रवैया रखते हुए मैंने सोचा- शायद सो गई होगी।
आप यकीन नहीं करेंगे, मैंने वह मैसेज कई-कई बार पढ़ा। जि़ंदगी की उलझनों को बांटने वाले दोस्तों में गुम हो गया एक साथी वापस मिल गया था। सुबह का इंतजार करते हुए आंख लग गई। अगले दिन भी मैंने ही आगे होकर उसे फोन लगाया, उसके फोन उठाते साथ ही कुछ नहीं बोली बस फूटकर रो पड़ी। ऐसे जैसे कोई रूठा बच्चा, मां के मनाने पर गले लगकर रो पड़ता है। उस एक दिन में हमने हर घंटे फोन पर बात की और पुरानी बातें याद करके कभी हंसे, तो कभी उदास हुए।
कितनी सच्ची बात है कि जि़ंदगी की उलझनें शरारतों को कम कर देती हैं, और लोग कहते हैं कि हम बदल गए हैं।
वो कहती- तुझे याद है पिट्ठू का वह खेल, जिसमें खेलते वक्त बॉल से तेरे सिर पर चोट लग गई थी। मैंने उसे बताया- बचपन की वह चोट सिर में निशानी के तौर पर आज भी मौजूद है। 
दोस्त बनाने के लिए या बनने के लिए उम्र की नहीं समझ की जरूरत होती है। बहुत से लोग सोचते हैं कि उम्र के फासले दोस्ती की नींव नहीं रख सकते, तो फिर मां-बेटी या पिता-बेटे कैसे अच्छे दोस्त बन जाते हैं, पूछे कोई उनसे! दरअसल बात उम्र की नहीं, विचारों के तालमेल की है। एक-दूसरे को समझने की है। 'मैंÓ से निकलकर 'हमÓ बनकर सोचेंगे, तो 'अहमÓ नहीं पाएंगे, 'अहमियतÓ देखेंगे।
खैर, बातों-बातों में हमने अपने स्कूल-टाइम की वह फेयरवेल भी याद की। हमारे यहां फेयरवेल पर एक रिवाज था। जूनियर्स, सालभर सीनियर्स के व्यवहार का आकलन करने के बाद और उनकी कद-काठी के अनुरूप फेयरवेल के दिन एक पर्ची के साथ अपनी तरफ से उनका परिचय देते थे। जैसे मुझे याद है आज भी एक छोटी और मोटी सीनियर का परिचय था- इंच में न फुट में, बड़ों-बड़ों के गुट में। बस, ऐसे ही हमारी फेयरवेल में भी एक पर्ची में मेरी दोस्त का नामकरण हुआ था- हिडंबा। तभी से हम उसे आज तक हिडंबा ही कहते आ रहे हैं। आज हमें फिर से मिले हुए पूरे चार महीने हो चुके हैं। हिडंबा के मिलने के साथ ही हमारा ग्रुप एक बार फिर पूरा हो चुका है। 
मेरी तरह आप भी शायद ये सोचते होंगे कि जि़ंदगी में कितने परिवर्तन आते हैं - क्लासरूम से ऑफिस, जींस से फॉर्मल, पॉकेटमनी से सेलेरी, लेकिन दोस्त वही- नालायक के नालायक। आखिर, हर एक फ्रैंड जरूरी होता है। दोस्त ने मुझे एक बात बिना कहे ही समझा दी- माफी मांगने का ये मतलब हर्गिज़ नहीं कि आप गलत हो..। बल्कि इसका मतलब है कि आप अपने रिश्ते को अपने अहम से भी ज्यादा अहमियत देते हो।

- प्रिया 'लय'

Comments

Popular posts from this blog