एक रुपए वाला मध्यप्रदेश देना


मध्यप्रदेश ही नहीं, राजस्थान, चंडीगढ़, दिल्ली, हरियाणा, केरल हर प्रदेश की एक कीमत तय थी। कोई एक रुपए का मध्यप्रदेश लेना चाहता था, तो किसी को 10 रुपए वाले राजस्थान में रुचि थी। हर राज्य में छिपा था लखपति बनने का राज। मैं बात कर रही हूं भारत के कुछ यूनीक प्रोफेशन में से एक वर्षों पुराने लाटरी सिस्टम की। जैसे आज के समय में शेयर बाजार का बोल बाला है, ठीक उसी तरह बहुत पहले लाटरी सिस्टम की रौनक देखी जाती थी। तब हम जबलपुर में रहते थे। वहां मैंने हर वर्ग, हर उम्र के व्यक्ति को लाटरी खरीदते देखा। लड़का हो या लड़की, महिला हो या पुरुष, बच्चे हों या बूढ़े लाटरी खरीदकर सभी अपनी किस्मत आज़माने को लालयित नज़र आते थे। तब बच्चे पिगीबैंक में सिक्का डालने के बजाए उस एक रुपए से लाटरी खरीदकर अपना भाग्य देखने को आतुर नजर आते थे। क्या पता किसका सिक्का मार्केट में चल जाए। जैसे गली-चौबारों में किराने की दुकानें होती थीं, ठीक उसी की तर्ज पर लाटरी की दुकानें भी खोली गई थीं। दुकानों पर चिपका कोई विशाल आकार का लाटरी टिकट का पोस्टर किसी फिल्मस्टार के पोस्टर से भी ज्यादा आकर्षक होता था। हर सप्ताह या माह में प्रथम, द्वितीय और तृतीय विजेता घोषित किए जाते थे, जो क्रमश: 10 हज़ार, 15 हज़ार और 25 हज़ार रकम के मालिक बनते थे।
दरअसल लाटरी सिस्टम की शुरुआत के पीछे सरकार की अपनी एक रणनीति थी। बात यूं थी कि उस दौर में जुआरी-सटोरियों की काफी भीड़ हुआ करती थी। हर गली में कोई न कोई एक नामी जुआरी रहता था, जो रात के समय लोगों को सट्टा खिलाता था। लोग भी जुओं में पैसा लगाकर दोगुना कमाना चाहते थे। ये अलग बात है कि सौ में से एकाध पर ही भगवान की मेहर होती थी। लेकिन जुआ तो जुआ है, एक नशे की तरह उसने अधिकांश लोगों को अपनी चपेट में ले रखा था।
जिस तरह आज हर व्यक्ति केबीसी में जाकर करोड़पति बनने की चाह रखता है, ठीक उसी तरह लाटरी की दुकान से ली गई दस रुपए की लाटरी से लोग लखपति बनने की अपनी इच्छा को कम नहीं होने देते थे और बार-बार असफल हो जाने के बाद भी हर बार एक नई उम्मीद से लाटरी का टिकट खरीदते थे। क्या पता कब भगवान मेहरबान और बंदा धनवान हो जाए।
आज के दौर में एलआईसी एजेंट की तरह तब लॉटरी एजेंट होते थे, जो लोगों को लखपति बनने का सपना दिखाते थे। लाटरी के प्रचार-प्रसार के लिए एजेंट अपनी-अपनी गाडिय़ों में भौंपू लगवाकर चीखते हुए लोगों में लालच का बीज बोते थे।
अब जब लोग सट्टे में पैसे लगाना ही चाहते थे, तो सरकार ने उसे ग्रीन कार्ड की तरह मार्केट में उतारा और नाम दिया- लाटरी सिस्टम। जो बहुत कम कीमत में आपको बंपर ड्राफ्ट के साथ लखपति बना सकती थी। एक रुपए से लेकर दस रुपए तक की लाटरी में आप एक लाख से लेकर दस लाख तक जीतकर बंपर ड्राफ्ट के विजेता बन सकते थे। राज्य के नाम से चलने वाली ये लाटरियां साप्ताहिक और मासिक दोनों होती थीं। यानी कुछ लाटरियां सप्ताह के अंत में खुलती थीं, तो कुछ माह के अंत में।
तयशुदा तारीख में रात 11 बजे करीब सबकी किस्मत का फैसला होता था। रेडियो पर इसका सीधा प्रसारण किया जाता था, ताकि घर बैठे लोग भी अपनी-अपनी लाटरी टिकट का नंबर मिला पाएं। दस अंकों वाली लाटरी के टिकट में एक-एक नंबर पर लोगों की सांसें ऊपर-नीचे होती थीं। किसी के अगर लगातार 5 नंबर मैच हो गए, तो आस-पास के लोगों को उन्हें संभालना पड़ता था, क्या पता ज्यादा खुशी में आदमी को लाटरी अटैक मतलब हार्ट अटैक ही न आ जाए। मगर जैसे ही सातवां नंबर लाटरी टिकट से हटकर हुआ, तो फलां व्यक्ति की हालत ऐसी हो जाती थी, मानो किसी ने छठे माले की मंजिल से नीचे फेंक दिया हो। तब भी उसे संभालने के लिए दो-तीन आदमी एक्स्ट्रा चाहिए होते थे।
बहरहाल, लाटरी टिकट जीतकर लखपति भले ही न बन पाए हों, मगर सपने देखने जरूर शुरू कर दिए। लाटरी शब्द आज भी किस्मत के साथ ही जोड़ा जाता है, जब लोग आपकी किसी बेइंतहा खुशी देखकर पूछते हैं - क्या बात है, लाटरी तो नहीं लग गई आपकी!
आज पुरानी पेटी का सामान खाली करते वक्त महालक्ष्मी लाटरी का टिकट मिला, जो उन दिनों मैंने भी खरीदा था, बस लखपति बनने का वह क्रेज याद आ गया बाई गॉड की कसम।

- प्रिया 'लय'

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