सिर्फ अहसास है, ये रूह से महसूस करो....



प्यार, मुहब्बत, इश्क...! आधुनिकता की धारा में बहते लोगों ने इन लफ्ज़ों की परिभाषा ही बदल दी है। अब प्रेम के इन मीठे शब्दों के मायने तक फीके हो गए हैं। कोई यह कैसे बताए कि किसी खास दिन हाथ में महज़ एक फूल लेकर 'उसेÓ 'आई लव यूÓ कह देना भर प्यार नहीं होता। सच्चे प्यार का तो अहसास मात्र दो लोगों को कभी न टूटने वाली डोर में बांधे रखता है। दरअसल ये सारी बातें मेरे दिमाग में कुछ दिनों से चल रहे किसी कार के एक टीवी विज्ञापन की वजह से कौंदीं, जिसमें ड्राइव कर रही एक लड़की अपने बॉयफ्रैंड को घर पर छोड़ती है और जैसे ही वह मुड़कर घर की तरफ चलना शुरू करता है, लड़की कार की डिक्की खोलती है, जिसमें से उसका दूसरा बॉयफ्रेंड निकलता है। 
थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं, प्यार तो वह था, जो हमारे नाना और नानी, दादा और दादी के बीच था। या मोहब्बत तो वह है, जो आज भी मेरे पापा और मां के बीच है। अब तो प्यार मार्केट वैल्यू से चलता है। इश्क की मैनुफैक्चरिंग होने से पहले ही एक्सपायरी डेट आ जाती है। मेरी नानी बताती थीं कि उनकी शादी तय होने और शादी के बाद अपने कमरे में जाने तक उन्होंने नाना को नहीं देखा था। फोटो-वोटो देखने-दिखाने की बात तो बहुत दूर की है। पहले तो बस लड़के-लड़की के माता-पिता ही उनका रिश्ता तय कर देते थे। और उसी रिश्ते को उन्हें ताउम्र बिना शिकायत निभाना पड़ता था। इसे मजबूरी नहीं, बल्कि बड़ों का आशीर्वाद माना जाता था। विश्वास होता था कि माता-पिता जिसे उनके लिए चुनेंगे, वह सर्वश्रेष्ठ ही होगा या होगी। अब तो लड़का-लड़की जब तक डेट पर न जाएं, कुछ तय नहीं करेंगे।
मैंने बचपन में अपने पाठ्यक्रम में डॉप्लर प्रभाव (किसी आवाज/आहट को पहचान की क्षमता) के बारे में पढ़ा था, जिसका उदाहरण मैंने असल जिंदगी में देखा, वो इस तरह कि मेरी मां, दूर से ही पापा की आहट पहचान जाती हैं। वहीं दोपहर में पापा कितनी भी गहरी नींद में हों, भजन से मां लौटतीं, तो आवाज़ लगाने से पहले ही पापा उनकी चूडिय़ों की आवाज़ पहचानकर दरवाजा खोलने उठ बैठते। आंखों से भले कम दिखाई दे, मगर मां का दिल पापा के चेहरे पर आई परेशानी महसूस कर लेता है। वे पापा की आवाज की पिच से ही समझ जाती हैं कि उनकी पीठ में आज भयानक दर्द है, फिर पापा पुरुष अहम के चलते उन्हें बताएं, न बताएं। मां ड्रॉअर में बाम टटोलतीं और मुंह ही मुंह में कुछ बुदबुदाते हुए पापा की पीठ पर लगा देतीं। जैसे कह रही हों - 'ऐजी, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी।Ó शायद यही प्यार है, जिसने बिना बताए ही अहसास करवा दिया। नाना के खाने के बाद उनकी थाली में ही नानी का अपने लिए भोजन परोसना और हाथ धोकर नाना का आखिरी क्षणों तक नानी की सीधे पल्लू वाली सूती साड़ी के छोर से हाथों को पोंछना, शायद यही प्यार है!
हर औरत चाहती है कि वह पति के सामने ही इस दुनिया से विदा ले, पर सभी को ये सुख हासिल नहीं होता, उनमें से एक मेरी नानी भी रहीं। शायद इसीलिए मेरी मां जब भी बीमार होती हैं, बस उनके मुंह से फिक्स डायलॉग सुनने को मिलता है- 'हे मातारानी, इनके कंधे पर ही जाऊं, ऐसा आशीर्वाद देना।Ó बस इतना सुनकर पापा कॉलोनी के डॉ. अली को बुलाकर एक-दो ड्रिप चढ़वा देते। जैसे मन ही मन कह रहे हों- धर्मपत्नी, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगा।
बचपन से देखे इन बुजुर्गों और अनुभवियों के आपसी प्यार ने ही हमारे बीच एक छवि निर्मित कर दी कि शायद हर जोड़े में प्यार की यही शिद्दत होती है।
पर जमाना बहुत आगे निकल गया है बाबूमुशाय, अब तो लव बड्र्स का दौर है। पहले जहां हीरो अपनी हीरोइन को साइकिल के डंडे पर बैठाकर सैर करा लाता था, अब वहीं आज का हीरो मर्सिडीज या बीएमडब्लू में अपनी हीरोइन को घुमाने ले जाता है। ढाई आखर प्रेम का - यह शब्द, लव में बदलकर कई पहलुओं में बंट गया। लड़कियां उम्र में अपने से बड़े और दिखने में ठीक-ठाक लड़के को पसंद कर लेंगी, पर बैंक बैलेंस में कमतर को नहीं। लड़के को भी प्रोफेशनल लड़कियां पसंद हैं, जिनके लक्ष्य हों, करियर हो, अच्छी-खासी पे-स्केल हो, साथ ही ग्लैमरस भी, फिर भले ही माता-पिता की सेवा करे न करे, पीढ़ी को आगे बढ़ाए न बढ़ाए।  

सोलह आने सच्ची बात कही है- 'सिर्फ अहसास है, रूह से महसूस करो।Ó जिस तरह फैशन वल्र्ड में पुराना फैशन लौट रहा है, उसी तरह काश! असल जिंदगी में भी 'एक्शन रिप्लेÓ जैसा कुछ हो जाए, और अनकहा, अनदेखा मगर सौ टका असल प्यार इस नए दौर में भी फिर दिखाई देने लगे।
- प्रिया 'लय'

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