उपहारों से न सज पाई लड़की का दर्द
कुछ समय पहले मार्केट में मेरी सहेली-दीदी (वो उम्र में मुझसे बड़ी हैं) की डॉ. भाभी मिल गईं। हालचाल पूछने के बाद सीधे मुद्दे की बात पर आईं, जैसे बरसों से मेरा इंतज़ार कर रही हों कि कब मैं मिलूं, और वे अपनी ननद को लेकर मन की भड़ास निकालें। उन्होंने बोलना शुरू किया- 'समझाओ उसे। दोस्त है तुम्हारी। बताओ कि तुम्हारी शादी हो गई, बेटा हो गया। वो उम्र में तुमसे काफी बड़ी है और अभी तक कुंवारी बैठी है। अब लड़कों को पसंद करने की उम्र नहीं रही। जो हम पसंद करें, उससे शादी कर ले। कब तक यूं भाई-भाभी के घर में बैठी रहेगी, किसी न किसी से तो शादी करनी ही होगी न। अच्छे लड़के की ख्वाहिश थी, तो पैसेवाले घर में पैदा होना था।Ó
ये वही भाभी है, जो कभी उसे ननद से ज्यादा अपनी सहेली समझती थी, मगर आज दूध का दूध और पानी का पानी हो गया सा लगा।
४० की दहलीज़ पर खड़ी अविवाहित लड़की को अब घर से ताने मिलने लगे हैं। भाभियां उसे बोझ समझती हैं, दोनों भाई बात-बात पर टोकते रहते हैं। माता-पिता न चाहते हुए भी अपने बेटे-बहू के सामने उसे उल्टा-सीधा कहते हैं, ताकि बेटी को उनसे ज्यादा जली-कटी न सुनने मिले। भाभियों की कड़वी ज़बान से मां की झिड़की उसे कम तकलीफ पहुंचाती है। वह जानती है कि मां बंद कमरे में बेटी को गले लगाकर उसके आंसुओं को पोंछ लेगी। बेटी अपने पैरों पर खड़ी है, मगर शादीशुदा नहीं है। बस, सबसे बड़ा दोष तो यही है उसका।
डॉ. भाभी से ही पता चला कि सहेली-दीदी के माता-पिता भी नहीं रहे यानी अब उसे भाई-भाभियों के तानों से बचाने वाला कोई नहीं रहा।
मध्यमवर्गीय होने के कारण लड़कों की बड़ी-बड़ी मांग उसके परिवारवाले पूरी करने में असमर्थ रहे, नतीजा बेटी अपने घर (ससुराल) नहीं जा पाई। दो भाइयों की इकलौती चहेती बहन और माता-पिता की लाड़ली ने कभी सोचा नहीं होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि जब उसका ही परिवार पराया हो जाएगा।
माता-पिता पहले अपनी बच्चियों को पढ़ाने-लिखाने, अच्छी जि़ंदगी देने में अपनी पूंजी खर्च करते रहते हैं और फिर उनके विवाह में दहेज जैसी अनचाही मांगों को पूरी करने के लिए अपनी जमापंूजी भी खर्च कर देते हैं। मैंने तो यहां तक देखा कि अपनी नाक बचाने के लिए भी कुछ माता-पिता बेटियों को उपहारों (दहेज का आधुनिक नाम) से लाद देते हैं, ताकि समाज में उनका मान बना रहे। फिर भले ही बाकी की जि़ंदगी उन्हें उस उधार को चुकाने में काटनी पड़े।
तभी कहते हैं कि ताली दोनों हाथों से बजती है, गलती करने वाला भी दोषी है और गलत सहने वाला भी। लेकिन इन सबमें पिसती है केवल लड़की, ताने मिले केवल लड़की को, रोना पड़ा केवल लड़की को, भोगना पड़ा है केवल और केवल लड़की को।
हालांकि अब जमाना बदल रहा है। लड़केवाले खुली ज़बान से दहेज की मांग नहीं करते, मगर ये तो कहते देखा ही गया है कि - हमें कुछ नहीं चाहिए, आप अपनी बेटी को अपनी इच्छा से जो भी देना चाहें, दे दें। वो उसी के लिए होगा। मतलब डबलबेड, कूलर, टीवी, अलमारी, डे्रसिंग टेबल यानी सारी जरूरत की चीजें। कान सीधे न पकड़कर घुमाकर पकडऩे का तरीका, बहुत सुलझा और सोचा-समझा।
अविवाहित लड़की के अपमान, सहनशक्ति और परीक्षाओं की यह प्रक्रिया शादी की उम्र पर आने से ही शुरू हो जाती है। शुरुआत लड़केवालों के देखने-दिखाने से होती है, उनके नाश्ते-पानी, सेवाभाव में पानी की तरह बहता पैसा और भावनाएं। इन सबके बाद भी लड़की पसंद न आए, तो 'सोचकर बताते हैं,Ó जैसे वाक्य। लड़की मन में आस लगाए, तो लगाती रहे, उनकी बला से। हद तो तब हो जाती है, जब लड़का, लड़की को पसंद कर लेता है। माता-पिता की रजामंदी से दोनों एक-दूसरे से बात करने लगते हैं, फोटो का आदान-प्रदान हो जाता है। लड़की लड़के से गहरे जुडऩे लगती है, उसके साथ जीवन के सपने देखने लगती है। शादी से पहले की रस्म निभाने का समय नजदीक आ जाता है और अचानक लड़केवालों के यहां से खबर मिलती है कि यह शादी नहीं हो पाएगी। कारण, वही घिसे-पिटे, लड़की के पिता द्वारा दहेज में मांगी गई नकदराशि या उपहारों में किए जा रहे फेरबदल।
लड़की अंदर से टूट जाती है। भावी पति मानकर उसके साथ देखे सपने, जो उसे खुशी देते थे, अब रह-रह कर तकलीफ पहुंचाने लगते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ सहेली-दीदी के साथ।
काश! ऐसे में लड़का दृढ़ता से कदम बढ़ाए, अपने माता-पिता को समझाए कि वे बेटे को बेच नहीं रहे। उसके लिए जीवनभर साथ निभाने वाली संगिनी ला रहे हैं। तो इस तरह शायद एक सपना बच जाए, किसी का अपना बच जाए।
सोचा था कुछ लिखूं। पर जाने दो, नही लिखता।
ReplyDeleteसोचा था कुछ लिखूं। पर जाने दो, नही लिखता।
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