घर का मुखिया, परिवार की मजबूत कड़ी
कभी बड़ा-सा हाथ खरच और कभी हथेली की सूजन... मशहूर कविता की ये तहरीर हमारी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से और घर के मजबूत स्तंभ के बारे में लिखी गई हैं। पिछले कई सालों से सुबह ठीक पांच बजे उठने वाले उस शख्स के नियम में आजकल परिवर्तन आ गया है। पीठ सीधी करके चलने वाले उस व्यक्ति की कमर का झुकाव कुछ कहना चाहता है। कड़क आवाज़ के लिए मोहल्ले में मशहूर उस इंसान की अब रातों में कराहने की आवाज़ें सुनाई देने लगी हैं। ये सब जानकर उनके प्रति मेरी चिंता बढऩे लगी है। अंजाना डर सताने लगा है, पर मैं इतनी जल्दी उन्हें अपने से दूर होने नहीं दूंगी। अगर वो मेरे पिता हैं, तो मैं भी उनकी बेटी हूं। हठी हूं बिल्कुल उनकी तरह।
आज किसी बात पर पिता का अनुभव सुनाया, तो समझ आया पिता कितने कीमती हैं। पिता बिना जीवन कैसा होता होगा, मैं नहीं जानती। मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हंू, जिनके सिर पर पिता का साया है और मैं प्रार्थनाओं में उनकी लंबी उम्र की हमेशा कामना करती हूं। मगर जैसा संसार का नियम है बेटी को विदा होना ही पड़ता है, इसलिए आज उनसे दूर होकर उनकी कमी का अहसास जरूर है।
मां का दुलार, मां के उदाहरण, मां की दी सीख, किचन के साथ गृहस्थी के टिप्स आदि तो हमेशा चर्चा में बने रहते हैं, मगर पिता परिचर्चा का हिस्सा बहुत कम बनते हैं। इसलिए आज जब पिता चर्चा का केंद्र बिंदु बने, तो समय का पता ही नहीं चला। पिता अक्सर हस्ताक्षर के रूप में स्कूली कागजातों में अहम नज़र आते रहे, मगर जि़ंदगी में उनकी अहमियत शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।
पिता की देहरी छोड़कर समझ आया कि पिता अनुशासन हैं, पिता जि़द हैं, पिता नियम हैं और पिता संयम हैं। बचपन में सुबह स्कूल जाने के लिए जल्दी उठाते रहे, तो अब बच्चे को समय पर स्कूल भेजने के लिए उठाते हैं। मां हमेशा कहती है कि जननी को बच्चों के लिए मां बनना नहीं पड़ता, नौ माह गर्भ में रहकर बच्चों का लगाव प्रकृतिप्रदत्त मां से होता है, मगर जनक को पिता बनने के लिए मशक्कत करनी होती है। शायद इसलिए जब पिता से रिश्ता गहरा हो जाता है, तो विदाई के वक्त मां से ज्यादा पिता के कलेजे से लगकर फूट-फूटकर रोना आता है। सोते बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर अपना स्नेह जताने वाले और मां की फटकार पर रोते बच्चे को अपनी बातों से बहलाने वाले ठेठ पिता का दिल अंदर से बहुत नर्म होता है। तभी तो बहाने का सच मां समझ जाती है, मगर पिता को हमारी हर बात सांची लगती है। मां को मनाना थोड़ा ठेढ़ी कील रहा है, मगर पिता को मनाना शुरू से ही आसान। जैसा कि कहा जाता है कि बेटियां पिता के काफी करीब होती हैं, मेरा अनुभव भी यही कहता है। मेरे लिए भी मेरे पिता रोलमॉडल हैं, मैं उनकी तरह कर्मठ, सहनशील, मेहनती बनना चाहती हूं। मुझे तब बहुत गर्व महसूस होता है जब लोग कहते हैं पिता की तरह लंबी नाक है, इसलिए गुस्सा भी उन्हीं की तरह नाक पर रखा रहता है और इस तरह मेरे गुस्से का प्रतिशत कम हो जाता। पिता का प्रतिबिंब कहलाना किस संतान को अच्छा नहीं लगता होगा न!
पिता की परिभाषा, पिता का स्नेह, पिता की परवाह सबके लिए एकजैसी होती है। पिता के न रहने पर सोहा अली के आंसू झूठे नहीं, श्वेता नंदा की परवाह पिता के लिए दिखावा नहीं। बेटी की विदाई का दर्द बच्चन साहब की आवाज़ में 'कहता है बाबुल ओ मेरी बिटियाÓ में साफ समझ में आता है। आधी रात में उठकर ठिठुरते बच्चों को चादर ओढ़ाने का काम सिर्फ पिता ही कर सकते हैं। पिता कर्म हैं, पिता धर्म हैं। पिता का कोई सानी नहीं और दुनिया में पिता जैसा कोई स्वाभिमानी नहीं।
आज किसी बात पर पिता का अनुभव सुनाया, तो समझ आया पिता कितने कीमती हैं। पिता बिना जीवन कैसा होता होगा, मैं नहीं जानती। मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हंू, जिनके सिर पर पिता का साया है और मैं प्रार्थनाओं में उनकी लंबी उम्र की हमेशा कामना करती हूं। मगर जैसा संसार का नियम है बेटी को विदा होना ही पड़ता है, इसलिए आज उनसे दूर होकर उनकी कमी का अहसास जरूर है।
मां का दुलार, मां के उदाहरण, मां की दी सीख, किचन के साथ गृहस्थी के टिप्स आदि तो हमेशा चर्चा में बने रहते हैं, मगर पिता परिचर्चा का हिस्सा बहुत कम बनते हैं। इसलिए आज जब पिता चर्चा का केंद्र बिंदु बने, तो समय का पता ही नहीं चला। पिता अक्सर हस्ताक्षर के रूप में स्कूली कागजातों में अहम नज़र आते रहे, मगर जि़ंदगी में उनकी अहमियत शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।
पिता की देहरी छोड़कर समझ आया कि पिता अनुशासन हैं, पिता जि़द हैं, पिता नियम हैं और पिता संयम हैं। बचपन में सुबह स्कूल जाने के लिए जल्दी उठाते रहे, तो अब बच्चे को समय पर स्कूल भेजने के लिए उठाते हैं। मां हमेशा कहती है कि जननी को बच्चों के लिए मां बनना नहीं पड़ता, नौ माह गर्भ में रहकर बच्चों का लगाव प्रकृतिप्रदत्त मां से होता है, मगर जनक को पिता बनने के लिए मशक्कत करनी होती है। शायद इसलिए जब पिता से रिश्ता गहरा हो जाता है, तो विदाई के वक्त मां से ज्यादा पिता के कलेजे से लगकर फूट-फूटकर रोना आता है। सोते बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर अपना स्नेह जताने वाले और मां की फटकार पर रोते बच्चे को अपनी बातों से बहलाने वाले ठेठ पिता का दिल अंदर से बहुत नर्म होता है। तभी तो बहाने का सच मां समझ जाती है, मगर पिता को हमारी हर बात सांची लगती है। मां को मनाना थोड़ा ठेढ़ी कील रहा है, मगर पिता को मनाना शुरू से ही आसान। जैसा कि कहा जाता है कि बेटियां पिता के काफी करीब होती हैं, मेरा अनुभव भी यही कहता है। मेरे लिए भी मेरे पिता रोलमॉडल हैं, मैं उनकी तरह कर्मठ, सहनशील, मेहनती बनना चाहती हूं। मुझे तब बहुत गर्व महसूस होता है जब लोग कहते हैं पिता की तरह लंबी नाक है, इसलिए गुस्सा भी उन्हीं की तरह नाक पर रखा रहता है और इस तरह मेरे गुस्से का प्रतिशत कम हो जाता। पिता का प्रतिबिंब कहलाना किस संतान को अच्छा नहीं लगता होगा न!
पिता की परिभाषा, पिता का स्नेह, पिता की परवाह सबके लिए एकजैसी होती है। पिता के न रहने पर सोहा अली के आंसू झूठे नहीं, श्वेता नंदा की परवाह पिता के लिए दिखावा नहीं। बेटी की विदाई का दर्द बच्चन साहब की आवाज़ में 'कहता है बाबुल ओ मेरी बिटियाÓ में साफ समझ में आता है। आधी रात में उठकर ठिठुरते बच्चों को चादर ओढ़ाने का काम सिर्फ पिता ही कर सकते हैं। पिता कर्म हैं, पिता धर्म हैं। पिता का कोई सानी नहीं और दुनिया में पिता जैसा कोई स्वाभिमानी नहीं।
- प्रिया 'लय '
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