मैं होकर भी, मैं अब नहीं
आज की सुबह रोज की तरह नहीं थी। स्कूल के लिए उठाने वाली मां की आवाज ही नहीं आई, नाश्ते की टेबल पर दीदी का शोर सुनाई नहीं दिया, गेट के बाहर पापा की गाड़ी ने हॉर्न नहीं दिया। सबकुछ सुनसान-सा और हर शख्स परेशान सा दिखाई दिया। चारों तरफ अगर कुछ था, तो बस खामोशी। सब मौन थे, बावजूद इसके, परिवार के हर सदस्य की आंखें पूछ रही थीं आखिर मैंने ऐसा क्यूं किया?
ऐसा नहीं है कि मैं परेशान नहीं हूं, मगर उनके सवालों का जवाब नहीं दे सकती। कभी नहीं दे सकती। मैं अंदर ही अंदर सोचती हूं कि काश उस पल को फिर से अपनी जि़ंदगी में लौटा सकूं, सबकुछ पहले की तरह कर सकूं, मगर...। मगर अब ये सब संभव नहीं है। कुछ भी संभव नहीं है। मैंने सबकुछ खो दिया पापा का प्यार, मां का दुलार, दीदी की फिक्र, दोस्तों की झड़प और अपना अस्तित्व। आज तक सिर्फ सुना था मृत शरीर को पंचतत्व में विलीन होना, उसे महसूस भी करके देख लिया।
कहते हैं न किसी भी चीज की कद्र उसके पास में न रहने से होती है, मुझे भी हो रही है, माता-पिता से दूर जाकर उनकी कमी खल रही है। उन्हें भी मेरी गैरमौजूदगी खाए जा रही है। मैं उनके पास होते हुए भी उनके पास नहीं हूं, बस अहसास है अनदेखा-सा, एक अदृश्य अहसास।
एक-एक करके दिन बीत रहे हैं। घर के बाहर का मौसम तो बदल रहा है, मगर अब 13 दिन बाद भी घर के अंदर की तस्वीर जस की तस है। वहां कुछ नहीं बदला, न मां के आंसु, न पापा की चिंता और न दीदी के सवाल।
हर तरफ बस खामोशी बिखरी है, सिर्फ खामोशी।
आज 13वां दिन है, सुबह से ही मां के आंसू रुक नहीं रहे, दीदी मेरी फोटो देख-देखकर चीख रही है कि मैं उससे बिना बोले क्यों चली गई, पापा हर दस मिनट में उठ-उठकर अंदर चले जाते हैं। शायद इसलिए कि वे हमेशा कहते थे कि पुरुष कभी रोते नहीं, पर आज वे झूठे साबित हो जाते।
धूमधाम से संपन्न होने वाले मेरे विवाह समारोह में सबको न्यौता देने का सपना संजोने वाले मेरे पापा शोक पत्र में मेरी तेरहवीं का बुलावा देते वक्त अपना सब्र खो बैठे और फूट-फूटकर रोने लगे।
जीवन, जो ईश्वर से वरदानस्वरूप मिलता है, ईश्वर का दिया अनमोल तोहफा, उसे मैंने अपने हाथों समाप्त कर दिया, वो वापस नहीं मिल सकता। अब सोचती हूं क्यों किया मैंने ऐसा। क्या मिला इसके बदले मुझे और क्या दिया इसके बदले में अपनों को। बस आंसू।
काश मैं अपनी परेशानी से लड़ती और उन पर विजय हासिल करती, तो शायद जिंदगी ही कुछ और होती। यूं हारकर सबको रुलाकर आंखें बंद न की होतीं। खुद को साबित करने का मौका मैंने अपने हाथों से ही खो दिया। मैं तो चली गई, पर अपने साथ परिवार के सपने भी ले गई, खुशियां भी ले गई।
शोक संदेश में लिखी एक-एक पंक्ति का मर्म आज समझ आ रहा है। मैं सबको देख पा रही हूं, पर सब मुझे नहीं देख पा रहे। मगर मैं कब तक इन सबको यूं ही देखती रहूंगी, जल्द ही मुझे इस अदृश्य उपस्थिति से भी विदा होना पड़ेगा। काश, अपने जीवन का अंतिम निर्णय लेने से पहले उसकी कीमत का अहसास किया होता, तो आज सबसे दूर होने की यूं भारी कीमत न चुकानी होती।
मैं किसी की बेटी, किसी की बहन, किसी की दोस्त थी, मगर अब मेरी पहचान के आगे स्वर्गीय शब्द जुड़ चुका है। मैं तो आत्महत्या जैसा क्रूर कदम उठाकर अपना सबकुछ खो चुकी हूं, लेकिन आप इस तरह का कदम उठाकर अपने अपराधी खुद न बनें। किसी भी कारणों से अपने अमूल्य जीवन की इतिश्री करने से पहले दाता के दिए जीवन का महत्व समझें। आपका जीवन सिर्फ आपका नहीं, उनका भी है जिन्होंने आपको इस दुनिया का हिस्सा बनाया, उनका अधिकार आप पर आपसे ज्यादा है। फेल हो जाने पर फांसी पर चढ़कर, पिता के डांटने पर तालाब में गिरकर, प्यार में असफल हो जाने पर जहर पीकर और जि़ंदगी में कुछ न कर पाने के गम में या मनचाही मंजिल न पा सकने की उदासी में अपनी जि़ंदगी को खत्म करने से पहले सोचें कि ये जीवन ईश्वर ने दिया है, तो जीवन लेने का अधिकार भी उसी का बनता है, आपका नहीं। यही प्रकृति का नियम है, इसका उल्लंघन करना मतलब ईश्वर के अधिकारों का हनन करना हुआ।
आत्महत्या करने जैसा गलत कदम उठाने से पहले अपने पीछे खड़े उन सभी लोगों के बारे में सोचिए, जिनकी जि़ंदगी आपके बगैर कुछ नहीं, वे हमेशा आपको गले लगाने के लिए बांहें पसारे खड़े नजर आएंगे। हर परिस्थिति में। अपने अनुभवों से कह रही हूं, यकीन मानिए!
आपकी
- स्वर्गीय अनीता सिंह
(शायद हर शख्स जो अचानक ही दुनिया से विदा ले लेता है, वह कुछ इस तरह ही सोचता होगा)
Behtareen ! Kaash nirassha mein dooba har vyakti bhagwan ke is anmol tohfe ko samajh sakta !
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