अपने ही हिंदोस्तान में हिंदी बन गई पराई
'देखो बेटा 'काउÓ आई। चलो उसे रोटी देंगे। बुलाओ- आजा काउ, आजा काउ।Ó दो साल के छुटके को उसकी मां गाय को रोटी देना सिखा रही थी। बच्चा काउ-काउ करके उसे बुला रहा था, और गाय जैसे काउ शब्द सुनकर बिदक रही थी। वह इंतज़ार में थी कि बच्चा प्यार से उसे 'गायÓ कहकर पुकारे, और वह मुंह घुमाकर बच्चे के हाथ से रोटी खा ले। गाय अपना मूल संबोधन खोना नहीं चाहती थी, और मां बेटे को काउ रटवाने के पीछे पड़ी थी। अंत में जब गाय को समझ आ गया कि दाल नहीं गलने वाली, तो वह रोटी की लालच में न पड़कर अपना आत्मसम्मान बचाते हुए पूंछ लहराती हुई दूसरी गली में मुड़ गई।
पूरे दृश्य से इतना तो समझ आ गया कि एक मां अपने बच्चे को दो सबक सिखा रही थी। एक गाय को अंग्रेजी में काउ कहते हैं और दूसरा गाय को रोटी देते हैं। मां अभी से बच्चे को अंग्रेजी के आगे झुकाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। वह खुद भी हमें बताती है कि 'फल-फ्रूटÓ खाने से सिर में 'हैडेकÓ नहीं होता। अंग्रेजी के बजाए वह हिंदी बोलने में ज्यादा समर्थ है, मगर उसकी मजबूरी है। वह जानती है कि आजकल लोगों की पहचान अंग्रेजी में गिटर-पिटर करने से ही बनती है। फिर वह और उसका बच्चा क्यों पीछे रह जाए। बेटा अभी से काउ बोलेगा, तभी तो वाउ, हाउ, नाउ तक पहुंचेगा।
अब तो स्कूलों में भी हिंदी बोलने पर सजा है। कल ही पड़ोसी बच्चे यश ने हिंदी बोलकर 50 रुपए का फाइन भरा है। लोकोक्ति, कहावतें तो शर्म से कहीं दफन ही हो गईं हैं। मैंने एक बार अपनी कक्षा में पूछा था कि ये अंग्रेजों की 'फूट डालो, शासन करो,Ó नीति क्या थी, आज उत्तर का व्यावहारीकरण देख रही हूं। सायमन 'गो बैकÓ होकर भी हमें अपने ही देश में पराया कर गए। आपस में ही एक-दूसरे को नीचा दिखाने का बेहतरीन तरीका सिखा गए। दरअसल देखा जाए, तो इसमें अंग्रेजों की कम हमारी ज्यादा गलती है। पश्चिमी संस्कृति को हमने इस कदर अपना लिया है कि पूछिए मत। अंग्रेजी म्यूजिक सुनना फैशन बना लिया और हिंदी में बोलना डिप्रेशन। ये अंग्रेजि़यत का ही तो प्रकोप है कि आधुनिकता के बहाव में छोटे अब बड़ों के पैर पडऩा आउट ऑफ फैशन समझ रहे हैं। अभी तो फिर भी चारदीवारी के अंदर घुटनों तक झुक जाते हैं, आने वाले समय में तो 'पायलागूÓ संस्कृति, सभ्यता से ही बाहर हो जाएगी। जबकि सोचने वाली बात ये है कि उन लोगों ने आज तक हमारी संस्कृति को नहीं अपनाया।
बात जरूरत की आती है मजबूरी की नहीं। अगर पांचवीं तक पढ़ीं नानीमां अपनी भाषा ही समझती हैं, तो उनके सामने अंग्रेजी में गिटर-पिटर करना न आपकी जरूरत है न मजबूरी। ये ठीक बीबीसी और दूरदर्शन जैसा है। एक की सुबह गुडमॉर्निंग के साथ होती है, तो दूसरा नमस्कार में सहज है। आशय साफ है, अंतर स्थान और लोगों की समझ के दायरे का है। वर्तमान में एक हिंदीभाषी अंग्रेजीजबान वाले के सामने ऐसा महसूस करता है, जैसे विज्ञापनों में सांवली चमड़ी वाला गोरे-चिट्टों के सामने हीनभावना से ग्रस्त दिखता है, पर इसका हल फेयरनेस क्रीम ही नहीं है। नौकरी के साक्षात्कार से लेकर जीवनसाथी के चयन तक में विदेशी भाषा की बड़ी भूमिका है। कुछ लोगों का मानना है कि अगर आपको अंग्रेजी आती है, तो आप लोगों को बेवकूफ बनाकर भी कमा सकते हैं।
विदेशी जबान पर पकड़ बनाते-बनाते लोग अपनी ही जबान भूलते जा रहे हैं। बच्चा भले ही पहला शब्द मां बोले, लेकिन दुनिया में चलने के लिए उसे मॉमा कहना ही सीखना होगा। पर जहां मां, 'मॉमाÓ बन जाती हैं, वहीं बेचारे पिता जीते जी 'डैडÓ हो जाते हैं। कल ही एक सहकर्मी अपनी व्यथा सुना रहे थे कि ये पिछलग्गू अंग्रेजी, योग्य होते हुए भी आगे बढऩे नहीं दे रही कमब़ख्त। हम हर साल हिंदी दिवस तो मनाते हैं, लेकिन जीवन का हिस्सा नहीं बना सकते। मुझे लगता है कि इससे बेहतर हिंदी दिवस की जगह इंग्लिश डे को ही सेलिब्रेट कर लेना चाहिए।
सॉरी के बजाए माफी शब्द दिल से जुड़ा है, माफी भी जल्दी मिलती जाती है सच! हिंदुस्तान में ही रहकर हिंदी से परहेज करते लोगों की भी मानसिकता समझ नहीं आती। वैसे देखा जाए, तो अब हिंदुस्तान में भी किसकी दिलचस्पी रह गई है।
जब बेजुबान जानवरों को अपना देशी संबोधन न सुनकर इतना बुरा लग सकता है, तो सोचिए हमारे चाचा-मामा-काका को अंकल शब्द सुनकर कितनी तकलीफ नहीं होती होगी। आप किंकर्तव्यविमूढ़ क्यों हो गए? मुझे खुद भी नहीं पता कि वह शुभप्रभात कब होगी, जब लोग आपस में हैलो-हाय छोड़कर, जय हिंद बोलकर अपने दिन का शुभारंभ करेंगे।
- प्रिया 'लय '
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