मोहल्ले में बसता हुआ एक आम आदमी
साइकल से उतरते वक्त एक बुजुर्ग की जेब से सिक्का गिर गया। बस वे लगे 10 मिनट तक यहां-वहां उस सिक्के को खोजने। कभी साइकल के नीचे देखते, तो कभी दाएं-बाएं खोजते। यही नहीं, उन्होंने एक ही जगह पर कइयों बार उसे देखा, मगर सिक्का तो जैसे उनसे आंख मिचौली खेल रहा था। ऐसी जगह छुपकर बैठा, जहां उन बुजुर्ग का ध्यान जाना ही नहीं था। अब उनके सब्र का बांध टूट रहा था, धीरे-धीरे उनके चेहरे पर शिकन आने लगी। सिक्का जि़द्दी था, तो सज्जन हठी। वह सोच रहा था कि किसी भी तरह नजर नहीं आऊंगा, मगर बुजुर्ग डटे थे कि उसे उठाकर दोबारा जेब में रखकर ही दम लेंगे। आखिर लंबे इंतज़ार के बाद एक की जीत हो गई, जीहां, बिना शक- बुजुर्ग की।
ये और कोई नहीं एक आम आदमी ही है, जो मात्र एक के सिक्के के लिए दस मिनट अपना खून जलाता रहा। उस सिक्के की कीमत उनसे बेहतर और कोई नहीं जान सकता। महंगाई इन जैसे लोगों के लिए ही बढ़ती है, ये कहना ज्यादा गलत न होगा। ऐसे आम आदमी हमें राह चलते कई मिल जाएंगे, जिनकी पाई-पाई जोड़ते हुए आधी से ज्य़ादा जि़ंदगी दो पहिया में गुज़र गई। इन्हीं लोगों पर लगा होता है ईमानदारी का ठप्पा, जिन्हें नई पीढ़ी से ये उलाहना मिलती है कि जि़ंदगी में कुछ नहीं कर पाए। ऐसे लोगों पर अक्सर असफल होने का तमगा भी लगा दिया जाता है, जो स्वयं उनके अपनों द्वारा ही मिलता है।
पैसों की कीमत समझने वाले इन लोगों की कद्र क्या वे कभी कर पाएंगे, जो आज भी धूप में रिक्शेवाले से एक-एक रुपए के लिए भाव-ताव करते हैं, मगर ब्रांडेड जींस खरीदते वक्त दुकानदार को गर्व से पाई-पाई देते हैं।
इन्हीं आम परिवारों में से कहीं रात की बची रोटियों से पोहा बनता है, तो कहीं बासी चावलों से पापड़। तो कहीं एक ही मोटरसाइकल पर पांच सवार एकसाथ यात्रा का लुत्फ उठाते नजऱ आते हैं। जहां पहली रोटी गाय को जाती है, तो आखिरी रोटी का हिस्सा कुत्ते को जाता है। पिक्चर की डुप्लीकेट सीडी लाकर थिएटर के 150 रुपए की टिकट बचाना हो या ट्रेन के जनरल डिब्बे में बिना टिकट यात्रा करना, आम वर्ग की ही आम निशानी है। मिट्टी की गुल्लक में डलती हर महीने की एक मुश्तराशि यहां दीपावली के पूजन में लक्ष्मी जी को चढ़ाई जाती है।
जिस तरह पैसे में पैसा आता है, वैसे ही गरीबी में ही आटा गीला होता है। महंगाई की मार सिर्फ आम आदमी के द्वार। एक और आम तथ्य पर नज़र गई कि आज भी डिस्प्रिन और क्रोसिन जैसी दवाइयों की बिक्री लगातार बनी हुई है। इसके भी दो मुख्य कारण हैं - एक तो इसके लिए डॉक्टर के पर्चे की जरूरत नहीं पड़ती और दूसरा, यह आम आदमी की सबसे बड़ी जरूरत है। शायद इसीलिए इन जैसे लोगों को बड़े-बड़े नामों वाली बीमारियां नहीं होती। आखिर बीमारी को भी स्टैंडर्ड पसंद है।
सरकार ने तो राउंड फिगर से बचने के लिए 25-50 के सिक्के बंद करवाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली, मगर सवा रुपए पर टिकी उस आम व्यक्ति की श्रद्धा पर किसी का ध्यान नहीं गया। मां की साड़ी के छोर में बंधी मन्नत हो या देवी के लिए नंगे पैर रहकर किए गए नौ दिनों के व्रत आम परिवार की आस्था का प्रतीक है।
भले ही इन जैसे लोगों के यहां कमरे कम और सदस्य ज्यादा होते हैं, मगर इनके यहां ठंडों में भी होती है रिश्तों की गर्माहट, जो किसी भी रूम हीटर से कम नहीं है। और गर्मी में होता है पूरा आकाश, जिसकी बराबरी दुनिया का कोई भी एसी नहीं कर सकता। ये आम वर्ग बड़ी-बड़ी कॉलोनियों या अपार्टमेंट में नहीं, बल्कि गलियों से गुजरकर मकानों के ढेर वाले किसी मोहल्ले में रहता है। ऐसे आम वर्ग को आवाम का सलाम और इतने अभावों के बावजूद भी मेरा देश महान।
- प्रिया 'लय'
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