ऐ री सखी, मेरी प्यारी सखी
हर छोटी-छोटी बात के लिए मैं उस पर बहुत गुस्सा करती थी, रोज स्कूल के लिए उसे इंतज़ार करवाती थी, उस पर झीकती थी, अपनी मनमानी करती थी, अपना टिफिन लंच के पहले ही खत्म कर देती थी और लंच में उसके टिफिन में अपना बड़ा-सा हिस्सा मांगती थी। हर बार उसका जन्मदिन भूल जाती थी और माफी भी नहीं मांगती थी, मेरे स्कूल न जाने पर उस पर भी स्कूल बंक करने का दबाव बनाती थी, मगर इन सब बातों के बावजूद वह -
मेरे स्कूल के लिए तैयार होने से पहले घर आ जाती थी, अपने टिफिन में मेरी पसंद की चीज़ें लाती थी, होमवर्क में मेरी मदद करती थी, मेरे गुस्से को चुपचाप सहन करती थी, हर साल ठीक 12 बजे मुझे जन्मदिन पर बधाई देती थी, परीक्षाओं वाले दिन अपने साथ-साथ मेरी तैयारी पर विशेष ध्यान देती थी।
वह मेरी बचपन की सहेली है- मेरी प्यारी सहेली, मेरी प्रगाढ़ सहेली, मेरे सुख-दुख की साथी। आज जब लोग फ्रैंड शब्द पर जोर देकर खुद को मॉडर्न घोषित करते हैं, मैं उसे सहेली, दोस्त, सखी जैसे शब्दों से संबोधित करके पिछड़ी पीढ़ी का कहलाना पसंद करती हूं। क्या कहूं उसके बारे में वह मेरी दोस्त नहीं है, अच्छी दोस्त है, बहुत अच्छी दोस्त, सबसे अच्छी दोस्त।
समय के साथ-साथ हमारी यह दोस्ती और भी गहराती गई। बचपन से लेकर आज तक उसके स्वभाव में न के बराबर भी अंतर नहीं आया, वहीं मुझमें ज़मीन से लेकर आसमान तक का परिवर्तन आ गया है। अब मैं पहले की तरह उससे बात-बात पर झगड़ा नहीं करती, उसके जन्मदिन पर ठीक बारह बजे बधाई देने का सिलसिला तो मेरी शादी के बाद से निरंतर चला आ रहा है। वह मुझे किसी बड़े की तरह सलाह देती है, बच्चों की तरह समझाती है, बुजुर्गों की तरह आशीर्वाद भी देती है, मां की तरह प्यार करती है और सच्चे साथी की तरह मेरे दुख में अपने अश्रु बहाती है। पिछले हफ्ते उसने इस बात को पुख्ता कर दिया कि वह मेरे दुख में अपने आंसुओं की बाढ़ ला सकती है। मैं अक्सर उससे पूछा करती थी कि मैं क्षणभर में क्रोधित हो जाने वाली और तुम सदा धैर्यवान, हम दो विपरीत स्वभाव वाले लोगों की दोस्ती कैसे हो गई? तो वह बस इतना कहती कि मेरे इस सवाल का जवाब मेरे ही सवाल में छुपा हुआ है- दो विपरीत स्वभाव वाले ही एक-दूसरे के अच्छे-सच्चे दोस्त हो सकते हैं। ये बात उम्र के इस मोड़ पर आकर बहुत अच्छी तरह समझ में आई। जब मैं बेटी के साथ-साथ किसी की पत्नी, मां, बहू, ननद, भाभी, चाची, मामी, मौसी और न जाने कितने रिश्तों में बंधी। बेटा क्रोध में मेरे कद को भी पार करता है, तब वहां मेरी सहनशक्ति, सौम्य व्यवहार उसे मेरे और करीब ला देता है। सहेली की कही बात दो विपरीत स्वभाव एक मन हो सकते हैं, चरितार्थ हुई।
परीक्षा परिणामों में मुझसे कम श्रेणी प्राप्त होने के बावजूद मेरी सफलता की बात पूरे मोहल्ले में बताने की खुशी मेरी नज़रों में उसे उच्च श्रेणी का दर्जा दे देती। जबकि इस बात को दबी ज़बान से आस-पास के लोग जताया भी करते, 'साथ स्कूल जाते हैं, साथ पढ़ते हैं, साथ रहते हैं, साथ ही नोट्स बनाते हैं, फिर दोनों के अंकों में इतना फर्क? जरूर वह छुपकर भी पढ़ाई करती है और इसे बताती तक नहीं।Ó लेकिन उनके ये कथन मेरे प्रति सहेली के विश्वास को ज़रा भी न डगा पाते।
स्कूल से लौटा बच्चा आज जब माय फ्रैंड विषय पर निबंध लिख रहा था, तो मेरी सहेली की भी कुछ भूली-बिसरी यादें दिल से आंखों में उतर आने लगीं। वहां बच्चा कागज पर अपने फ्रैंड के बारे में लिख रहा था और यहां मैं अपनी सहेली को परिभाषित करने की कोशिश कर रही थी।
अगर मैं ये कहूं कि अच्छे दोस्त किस्मत से मिलते हैं, तो शायद अतिश्योक्ति न होगी। इमली का खट्टापन और भी दांत खट्टे कर जाता है, जब दोस्त उसमें अपना हिस्सा बंटाकर साथ में चटखारे लेता है। गर्मियों की छुट्टियां बिना बर्फ के गोले खाए खत्म न हुईं और ठंडों में आंच से उतरते भुट्टे में नीबू लगाकर एक-एक दाना स्वाद ले-लेकर खाना आज भी मुंह में पानी ला देता है।
दोस्त के इर्द-गिर्द घूमती जि़ंदगी कितनी खुशनुमा होती है, महसूस करके देखिए। अच्छा लगेगा।
- प्रिया 'लय'
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