रिश्तों का पर्याय बनते अवकाश


लोगों का अब रिश्तों पर से विश्वास उठने लगा है। मगर इस विश्वास को कमजोर बनाने में गलती किसी एक की कभी नहीं होती। इस दुनिया में मुश्किल कुछ भी नहीं, फिर भी लोग इरादे तोड़ देते हैं। अगर सच्चे दिल से बनाया हो रिश्ता, तो सितारे भी किसी के लिए अपनी जगह छोड़ देते हैं। अभी-अभी रक्षाबंधन होकर गया है। जन्माष्टमी तक चलने वाले इस त्योहार की धूम समय के साथ फीकी पड़ती-सी लग रही है। ऑफिस में कुछ लोग मायूस थे, इसलिए नहीं कि लड़कियां अपने भाइयों को राखी नहीं बांध पाईं या लड़के अपनी बहनों से रक्षासूत्र नहीं बंधवा पाए, बल्कि इसलिए कि उन्हें राखी वाले दिन भी ऑफिस आना पड़ा। भले ही किसी की बहन या किसी का भाई उस शहर में रहता ही न हो, मगर अवकाश तो मिल जाता न। 'एक छुट्टी मारी गई,Ó लोग दबी ज़बान से कह रहे थे। वैसे भी आजकल बहुत से लोगों के लिए त्योहार का पर्याय अवकाश ही हो गया है।
सचमुच समय के साथ रिश्ते भी करवट लेते जा रहे हैं। दूरदराज में रहने वाली बहनें लिफाफों में बंद राखी के साथ अब हल्दी-चावल रखना लगभग भूल चुकी हैं। उस दिन रोज के मुकाबले मिसेज शर्मा ने फोन पर देर तक बात की। वे अपने मौसेरे भाई से बात कर रही थीं। लगभग एक घंटा गपियाने के बाद मैंने उनसे पूछा आपकी तो बहुत पटती है अपने मौसेरे भाई से! तो उनका कहना था - हां, मेरी मम्मी और मौसी की दांत काटी रोटी है। शायद इसलिए हम दोनों भाई-बहनों में भी शुरू से ही घनिष्टता है।
अब राखी का त्योहार आने वाला था, तो लगे हाथों पूछ ही लिया- आपने राखी भेज दी सभी भाइयों को? तो बदले में जवाब मिला, 'हां, अपने भाइयों को तो भेज दी। चचेरे-ममेरे, मौसेरे (जिसमें वह मौसेरा भाई भी शामिल था, जिससे घंटाभर बतियाकर अभी-अभी उन्होंने फोन रखा था।) भाइयों को नहीं भेजती। आगे चलकर रिश्ता न निभा पाई तो, ये सोचकर बचपन से ही उन्हें कभी भी राखियां पोस्ट नहीं कीं। और यही बात मैंने अपनी बेटी के लिए भी लागू कर दी है। जेठ के बच्चों को भी बेटी की तरफ की राखियां नहीं भेजती। उसके बड़े होने तक समय और बदल गया तो! क्या पता बेटी इन रिश्तों को निभा पाए या न निभा पाए, फिर सामने वाले को बुरा ही लगता है कि पहले तो राखी आती थी, अब तो धागा भी नहीं आता।Ó
भई, दिल जीत लिया कहकर कि दूर के भाइयों को बुरा न लगे, इसलिए शुरू से ही वह नियम बनाए, जो कभी न टूटे। मन तो हुआ कि पूछ लूं- फिर सगे भाइयों को अब तक राखी क्यों भेजती आ रही हो?
रिश्ता आप खुद ही नहीं निभा सकते थे, इसलिए सारी जिम्मेदारी समय पर थोप दो कि समय बदल गया, तो कोई क्या कर लेगा।
रिश्ते दूर तब होते हैं, जब उन्हें 'दूर के रिश्तेÓ का नाम दिया जाए। न कभी खुद ने इस त्योहार की अहमियत समझी, न अपनी संतान को समझाना चाहती हैं। ऐसे सोच वालों की वजह से आने वाले समय में बच्चे माता-पिता के पास नहीं रहते! कल को यही बच्चे कहेंगे कि माता-पिता की सेवा नहीं कर सकते थे, इसलिए उनके साथ नहीं रहते। जैसे को तैसा तो संसार का नियम ही है।
ऐसा न हो कि कुछ दिन बाद अपने पैरों पर खड़े होकर बच्चे माता-पिता से दूर रहने लगें, ये कहकर कि सेवा नहीं कर सकते थे, इसलिए पहले ही नियम बना लिया कि साथ नहीं रहेंगे।
- प्रिया 'लय'

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