चाबी है पड़ोस में...
कल रात हमारे पड़ोस में एक चोरी हो गई। जिस घर में चोरी हुई, वो दो घरों के बीच में था। मैंने सोचा जब उस घर में चोरी हो रही थी, तब क्या अगल-बगल वालों को ज़रा भी आहट नहीं हुई! शायद हुई या शायद नहीं हुई या शायद आंखें खुली रखकर, कान बंद कर लिए गए या फिर ये सोचकर ज़बान बंद रही कि कौन बाहर जाकर मुसीबत मोल ले, अपने पर ही आ गई, तो?Ó
ये बात अब कोई नई नहीं रही, आए दिन ये खबर सुनने में आती है कि फलाना के यहां चोरी हो गई और बगल वालों के कान में जूं तक नहीं रेंगी।
मुझे सालों पहले का वह समय याद आ गया, जब हम 4-5 दिन के लिए शहर से बाहर जाते थे, तो बगल वाली शर्मा आंटी को अपने घर की चाबी दे जाते थे, ताकि उनके घर का एक सदस्य रात में हमारे घर रुके। और तब भी, जब मम्मी-पापा काम से कहीं बाहर जाते और घर पर ताला डालना होता, तब भी चाबी शर्मा आंटी या दुबे आंटी के यहां होती थी। हम स्कूल से लौटते तो दूर से ही हमें देखकर आंटी आवाज़ लगातीं, 'मिक्की, चाबी हमारे यहां है। आजा पराठे रखे हैं, खाकर चली जाना।Ó
वह समय जब, पूरे मोहल्ले में सलीम अंकल के घर नया-नया टीवी आया था और आस-पड़ोस के सभी बच्चे टीवी देखने के लिए शाम 7 बजे से उनके घर जमा हो जाते थे। हमारे कुछ पसंदीदा सीरियल थे - स्टोन बॉय, देख भाई देख, स्पाइडरमेन, चित्रहार, रंगोली, पोटली बाबा की, चंद्रकांता, मालगुड़ी डेज़ और भी बहुत सारे।
वह समय भी जब मां को पता होता था कि दुबे आंटी को छोले बहुत पसंद हैं और जब भी घर में छोले बनते, तो दुबे आंटी का हिस्सा सबसे पहले निकलता था, जिसे पहुंचाने का काम अक्सर मैं ही करती थी।
दुर्गाजी जब आती थीं, तो पूरा मोहल्ला तो जगमग हो ही जाता था, हर घर की महिलाएं एक-से-बढ़कर एक भजन तैयार करने के लिए एक-दूसरे के घर जाना शुरू कर देतीं।
दुर्गा दर्शन के लिए एक नहीं दस-दस घरों के लोग एकसाथ जाया करते, वो भी पैदल। गपियाते हुए, मस्ताते हुए। भक्ति का नज़ारा यह होता कि जो लोग नौ दिन व्रत रखते थे, वह बिना चप्पल-जूते रहते थे, और हम सब बच्चों की जि़म्मेदारी यह होती कि हम उनका विशेष ध्यान रखें। यानी उनकी भक्ति में हमारी सेवा विशेष होती।
मुझे अच्छी तरह याद है जब मोहल्ले में किसी के घर शादी की बात चलती, तो लड़की देखने से लेकर शादी पक्की होने तक और माटी पूजन, हल्दी चढऩे, मंडप गडऩे से लेकर बारात निकलने तक हमारा जोश हर दिन बढ़ता रहता।
भरोसा, विश्वास, आशाएं, इच्छाएं, दोस्ती, रिश्ते किसे कहते हैं, ये तब जाना जब किसी बात पर शर्मा अंकल पापा से नाराज़ हो गए और दो दिनों तक उनके बीच कोई बात नहीं हुई। मगर जब शर्मा अंकल को पता चला कि पापा का एक्सीडेंट हो गया है और उनका पैर फ्रैक्चर हुआ है, तो खबर सुनते ही सबसे पहले शर्मा अंकल घर आए और पापा को गले लगाकर बोले, 'यार तू भी न देखकर गाड़ी नहीं चलाता। बता उस गाड़ी वाले का नंबर अभी उसे थाने में बंद करवाता हूं।Ó कहते हुए वे पापा के गले लग गए। उन दोनों की आंखों में पानी था और हमारे चेहरे पर मुस्कान।
ऐसी होती थी दोस्ती, बिल्कुल जय-वीरू वाली। जहां पराए भी अपनों से बढ़कर होते थे।
मेले जाना है, मतलब नेपाली मामा के साथ ढेर सारी मस्ती, झूले में झूलना, आइसक्रीम, गोलगप्पे खाना। पापा हम बच्चों को मामा के भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो जाते थे। स्कूल के वे दिन, जब मामा की साइकिल के आगे वाले डंडे में बैठकर रास्ता कट जाता था। ये था भरोसा, जो आज सगे रिश्तों में भी नहीं है।
मैं करीब 15-16 साल की हुई, तब एक दिन पता चला कि वह मेरे सगे मामा नहीं हैं, बल्कि मम्मी के राखीभाई हैं। मगर प्यार उन्होंने सगे मामा जैसा ही दिया।
अब शक्कर खत्म होने पर कटोरी लेकर कोई बगल वाली काकी हमारे घर नहीं आती।
संयुक्त परिवार, एकल बन गए। चाचा-मामा-ताऊ, सब अंकल और चचेरी बहन, ममेरा भाई, कजि़न सिस्टर-ब्रदर। साइकिल गुमनाम हो गई, कारें-बंगला स्टेटस सिम्बल बन गया। घर बड़ा, दिल छोटा। रिश्ते कम, नौकर ज्य़ादा।
अब तो मोहल्ले कॉलोनी, अपार्टमेंट, कैम्पस में तब्दील हो गए। घर की सुरक्षा के लिए हमने ही डबल लॉक सिस्टम लगवा लिया, पड़ोस में कब बच्चा जन्म ले लेता, उसका बर्थ डे सेलिब्रेट हो जाता है और शादी सम्पन्न हो जाती है, पता ही नहीं चलता। न कोई ढोल-ढमाका, न कोई बैंड-बाजा, न घोड़ा, न घोड़े के आगे नाचते बाराती।
आज सुबह कहीं से एक गाना कोनों में पड़ा, 'कोई लौटा मुझे बीते हुए दिन...Ó तो गाने के शब्दों के साथ-साथ मैं भी फ्लैशबैक में चली गई।
- प्रिया 'लय'
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