कल मरना है, तो क्यों न आज जी लें...
अभी बस पांच मिनट पहले एक जनाब का एसएमएस आया, जिसमें मशहूर पंक्तियां लिखी थीं- बिना लिबास आए थे इस जहान में, बस एक क$फन की ख़ातिर इतना स$फर करना पड़ा...
अभी मुंह से वाह! भी ठीक से न निकली थी कि तभी अचानक नजदीक में हो रहे शोर-गुल ने ध्यान खींच लिया। पता चला, कुछ लोग फलां व्यक्ति को पांच बार आए हार्ट अटैक को लेकर बतिया रहे थे। हर बार हार्ट अटैक आने के बाद फलां व्यक्ति कुछ दिनों के इलाज में तंदुरस्त हो जाता था। बस, यहीं आकर यह सीरियस बात मजाक का विषय बन गई और सभी लोग एकसाथ ठहाका मारकर हंसने लगे। इसी तर्ज पर दूसरे ने एक और उदाहरण की तरफ प्रकाश डाला कि बार-बार हार्ट अटैक झेल रहे किसी व्यक्ति के मुंह में जब भी आशंकावश गंगाजल डाला जाता, वह चंद लम्हों बाद उसी गंगा से चंगा हो जाता। अब तो डॉक्टर ने भी संकोच में कहना छोड़ दिया कि अगला हार्ट अटैक फलां व्यक्ति के जीवन के लिए भारी पड़ सकता है। बेचारे, हर बार शर्मिंदगी का शिकार बने। कोई मजाक है क्या! ये अलग बात है कि डॉक्टर ने भी दबी हंसी को आखिर फूट पडऩे दिया और कहा- भई आखिरी समय का सोचकर मुंह में डाला गया यही गंगाजल उनके लिए अमृत का काम कर रहा है।
बात थी तो बिल्कुल ज्ञानरंजन वाली, नहीं समझे ज्ञान+मनोरंजन= ज्ञानरंजन। इस पूरे वाकये में एक बात तो बहुत अच्छी तरह समझ आ गई कि अगर किसी को बता दिया जाए कि वह मरने वाला है, तो इस भय से वो अपने आज को जीने लगता है।
तो क्यों न यही बात हरेक व्यक्ति अपने जीवन में आत्मसात कर ले।
कई बार हमारी हिंदी फिल्मों के दृश्य भी घुमा-फिराकर यही संदेश देते नजर आते हैं, उदाहरण के तौर पर - मुन्नाभाई एमबीबीएस का वह दृश्य, जिसमें कैंसर से पीडि़त एक मरीज को मुन्ना वर्तमान को पूरी तरह से जीने की सलाह देता है। या फिर कल हो न हो का अमन, जो कल की भयावहता को जानते हुए भी सब भुलाकर आज को जी लेना चाहता है।
किसी को मौत का डर सताता है, तो कोई जिंदगी को खुशनुमा बना लेता है। ये ठीक वैसा ही है, जैसा जन्मदिन पर लोग सेलिब्रेट भी करते हैं और ये भी सोचते हैं कि उस दिन उनकी जि़ंदगी से एक साल कम हो गया। नजरिया बदला और मायने बदल गए।
सोचिए अगर दुनिया के हर इंसान को यह पता चल जाए कि फलां तारीख को उसकी जि़ंदगी का आखिरी दिन है, तो हर इंसान एक-दूसरे से अपने बुरे बर्तावों के लिए माफी मांगने लगे या फिर बैंकबेलेंस बनाने के पीछे दौड़ता बिज़नेसमेन परिवार के पीछे भागता नज़र आए। व्यस्तता के चलते कई दिनों से दोस्तों को पिक्चर के लिए बहाना बनाकर मना करने वाला मित्र, खुद जाकर दोस्तों से घूमने जाने की गुज़ारिश करता दिखे। शायद बड़े-बूढ़ों से सुनी बात कि - हर इंसान को अपने अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब ऊपर देना पड़ता है। सोचकर वह अपने आज को संवारने और कल को सुधारने लगता है।
मैं गारंटी दे सकती हूं कि मृत्यु की तारीख पता चलते ही करेले के नाम से भी कोसों दूर रहने वाली वर्मा आंटी सुबह-शाम करेले का जूस पीते नज़र आएंगी, ये सोचकर कि शायद खून बढऩे के साथ-साथ मौत की तिथि भी आगे बढ़ जाए। या पड़ोसी की दीवार उठने पर जगदीश चाचा ने जो शब्दों के बाण चलाए थे, उसके लिए वे उसी दीवार को फांदकर मुख़्तार चाचा से माफी मांगने पहुंच जाएं, क्या पता उस माफी से बंद स्वर्ग के दरवाजे खुल जाएं। भई, कौन है जो दुनिया से विदा होते-होते तेरा-मेरा करे, आखिर ऊपर तो सबका मालिक एक है न!
बहरहाल, मुद्दा घूम-फिर कर वहीं आ जाता है- अपना हर पल ऐसे जिओ, जैसे कि आखिरी हो। जीहां, गोलमाल-3 की लाइन दोहरा रही हूं। बातें किताबी जरूर हैं, पर व्यवहारिक बनाई जा सकती हैं। जनाब के एसएमएस की बात जहां चरितार्थ हो रही है- काहे को कितनी हाय-तौबा करना, खुलके जिओ, खिलके जिओ...
तो अब आप क्या सोच रहे हैं, पंडित को अपनी कुंडली दिखाने के बारे में या फिर ये कि आखिरी बार टॉकीज का मुंह कब देखा था?!!!!!!!!!!
- प्रिया 'लय'
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