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Showing posts from September, 2014
हमारे अपनों को ज्यादा जरूरत है हमारी आएगा जब भी खुशी या गम का कोई मौका, हमको बहुत रुलाएगा तुम्हारी यादों का झोंका। रोज़ की तरह आज भी शोक संदेशों पर नज़र गई। पांच बुजुर्गों के बीच दो युवा। जिनमें से एक के परिजनों ने शोक संदेश में ये भावभीनी दो पंक्तियां लिखी थीं। एक युवा की जान एक्सीडेंट में चली गई, पढ़कर दुख हुआ। मगर दूसरे युवा ने परीक्षा में कम नंबर आने की वजह से आत्महत्या कर ली, जानकर रोष हुआ। उनके बारे में ये खबरें अखबार में ही प्रकाशित थीं। ये हमारे लिए कोई चौंकाने वाली बात अब नहीं रह गई है। लंबे समय से शोक संदेशों पर बुजुर्गों के बीच युवाओं ने जगह बना ली है, चाहे-अनचाहे। हमारे युवा प्रधान देश में युवाओं का ये हाल देख-सुनकर अचरज होता है। जिन कंधों पर देश की जिम्मेदारी है, वे इतने कमज़ोर हैं? विधाता जीवन छीन ले, अलग बात है, मगर जीवन से हारकर स्वयं जि़ंदगी समाप्त कर देना, ये तो बुज़दिली हुई न! अखबारों के उठावना कॉलम पर नज़र जाती है, तो बुज़ुर्गों की भीड़ में युवक/युवतियों की तस्वीरें देखकर मन उदास हो जाता है, खासतौर से आत्महत्या करने वाले स्कूल-कॉलेज गोइंग बच्चों की तस्वीरें देखक...
अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो हर सुबह की तरह आज भी हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया। साथ में एक दुआ भी मांगी, 'हे प्रभु, अगले हर जनम में मुझे बेटी ही बनाकर भेजना, ताकि पिता के दिल के करीब रहूं और मां के मर्म को समझूं। बस किस्मत में उनसे बिछोह मत लिखना।Ó दुआ मांगते-मांगते मेरी बाईं आंख से पहला आंसू गिरा और मुझे किसी की कही बात याद आ गई- जब कोई खुशी में रोता है, तो उसकी दाईं आंख से पहला आंसू निकलता है और जब कोई दुख में रोता है, तो उसकी बाईं आंख से पहला आंसू गिरता है। आज मन दुखी था, किसी के लिए। कुछ दिनों पहले अचानक एक दुखद खबर मिली, मेरी एक दोस्त से उसकी मां का आंचल छिन गया। एक साल पहले ही उसने अपने पिता को खो दिया था और अब मां का जाना, उसे कैसी स्थिति में ले आया होगा, इसका मैं अनुमान भी नहीं लगा सकती। मैंने हर स्थिति से उसे लड़ते देखा है। पिता के जाने के बाद वह घर में अपनी बहन-भाई और मां के लिए घर का मुखिया बन गई थी। एक पुरुष की तरह हर जिम्मेदारियों का निर्वहन उसने अकेले किया। घर-ऑफिस के बीच संतुलन बनाकर जैसे-तैसे घर की गाड़ी को पटरी पर लेकर आई ही थी, कि मां के दिनोंदिन बिगड़ते...
तुम यूं बिना कुछ कहे क्यों चली गईं दिन 13 मई, वक्त शाम का, जगह कानपुर। खबर मिली कि ३२ वर्षीय दो बच्चों की मां ने खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली। कानपुर से यूं तो मेरा कोई सीधा संबंध नहीं है, न ही मेरा वहां कोई घरोबा ही है, मगर फिर भी एक लगाव तो था, लेकिन अब वो भी नहीं रहा। कोई रहता था मेरा, जिससे न तो खून का रिश्ता था, न रिश्तेदारी। लेकिन अब इस शहर से एक नया रिश्ता जरूर बन गया है- बैर का। 14 जून सुबह का वक्त, खाने की तैयारियों में लगी मैं दौड़-भाग कर रही थी कि अचानक मोबाइल बजा। आवाज सहेली की थी। एक मिनट तक तो वो रोती रही, मैं समझ नहीं पाई, बस उसे चुप कराने में लगी थी। धीरे-धीरे जब उसने खुद को संभाला, तो बस इतना ही बोलकर फोन रख दिया कि - संध्या ने 13 मई को आत्महत्या कर ली, मुझे आज ही पता चला। मैं स्तब्ध। न कुछ बोलते बना, न कुछ सुनते। किचन से निकली और खुद को ये यकीन दिलाने में लगी रही कि हो सकता है मैंने गलत सुना हो। अभी दिसंबर में ही तो मिले थे हम। पूरे दस सालों बाद। उसके गालों पे पड़ते डिंपल ने माथे की शिकन का जरा भी अंदाज़ा नहीं लगने दिया, हर बार की तरह। संध्या ने ऐसा कुछ भी नहीं...
ऐ री सखी, मेरी प्यारी सखी हर छोटी-छोटी बात के लिए मैं उस पर बहुत गुस्सा करती थी, रोज स्कूल के लिए उसे इंतज़ार करवाती थी, उस पर झीकती थी, अपनी मनमानी करती थी, अपना टिफिन लंच के पहले ही खत्म कर देती थी और लंच में उसके टिफिन में अपना बड़ा-सा हिस्सा मांगती थी। हर बार उसका जन्मदिन भूल जाती थी और माफी भी नहीं मांगती थी, मेरे स्कूल न जाने पर उस पर भी स्कूल बंक करने का दबाव बनाती थी, मगर इन सब बातों के बावजूद वह - मेरे स्कूल के लिए तैयार होने से पहले घर आ जाती थी, अपने टिफिन में मेरी पसंद की चीज़ें लाती थी, होमवर्क में मेरी मदद करती थी, मेरे गुस्से को चुपचाप सहन करती थी, हर साल ठीक 12 बजे मुझे जन्मदिन पर बधाई देती थी, परीक्षाओं वाले दिन अपने साथ-साथ मेरी तैयारी पर विशेष ध्यान देती थी। वह मेरी बचपन की सहेली है- मेरी प्यारी सहेली, मेरी प्रगाढ़ सहेली, मेरे सुख-दुख की साथी। आज जब लोग फ्रैंड शब्द पर जोर देकर खुद को मॉडर्न घोषित करते हैं, मैं उसे सहेली, दोस्त, सखी जैसे शब्दों से संबोधित करके पिछड़ी पीढ़ी का कहलाना पसंद करती हूं। क्या कहूं उसके बारे में वह मेरी दोस्त नहीं है, अच्छी दोस्त है, बहुत...
स्वागत कीजिए बिन बुलाए आलोचक का आप अधीर हैं? गुस्सैल हैं? जल्द ही काबू खो देते हैं? अपनी बुराइयां सुनने के आदी नहीं हैं? तो आपको जल्द ही एक अदद छिद्रान्वेशी को अपने खेमे में नियुक्त करने की जरूरत है। नहीं समझे, छिद्रान्वेशी मतलब वही आलोचक, समालोचक, समीक्षक, गुणदोष विचारक या कह लो क्रिटिक। प्यार से जिस नाम से भी पुकारो, चलेगा, बल्कि दौड़ेगा। ये वे संज्ञावाचक हैं, जिन्होंने आपके अंदर मौजूद कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी उठाई है। जैसे नगरनिगम हर गली-चौबारे की गंदगी साफ करके अपने शहर को स्वच्छ रखती है, ये भी समाज के ऐसे ही ठेकेदार हैं, जो आपके व्यक्तित्व में निखार लाते हैं। ्रअगर आपके आस-पास क्रिटिक मौजूद हैं, तो आप दुनिया के सबसे खुशकिस्मत इंसानों में से एक हैं। मुंह पर तारीफ करने वाले हज़ारों मिल जाएंगे साहब, पर आपके मुंह पर आपकी ही बुराई करने वाले जिगरवाले ही होते हैं। इसलिए इनका स्वागत कीजिए, क्योंकि ये ही लोग आपमें छुपी हुई उस खूबी की खोज करेंगे, जिसे आप नजरअंदाज करते आए हैं। जब भी कोई आपको आपके काम की बुराई करते नजर आए, तो समझिए आप तरक्की की सीढिय़ां चढऩे लगे हैं और अव्वल दर्जे क...
उपहारों से न सज पाई लड़की का दर्द कुछ समय पहले मार्केट में मेरी सहेली-दीदी (वो उम्र में मुझसे बड़ी हैं) की डॉ. भाभी मिल गईं। हालचाल पूछने के बाद सीधे मुद्दे की बात पर आईं, जैसे बरसों से मेरा इंतज़ार कर रही हों कि कब मैं मिलूं, और वे अपनी ननद को लेकर मन की भड़ास निकालें। उन्होंने बोलना शुरू किया- 'समझाओ उसे। दोस्त है तुम्हारी। बताओ कि तुम्हारी शादी हो गई, बेटा हो गया। वो उम्र में तुमसे काफी बड़ी है और अभी तक कुंवारी बैठी है। अब लड़कों को पसंद करने की उम्र नहीं रही। जो हम पसंद करें, उससे शादी कर ले। कब तक यूं भाई-भाभी के घर में बैठी रहेगी, किसी न किसी से तो शादी करनी ही होगी न। अच्छे लड़के की ख्वाहिश थी, तो पैसेवाले घर में पैदा होना था।Ó  ये वही भाभी है, जो कभी उसे ननद से ज्यादा अपनी सहेली समझती थी, मगर आज दूध का दूध और पानी का पानी हो गया सा लगा।  ४० की दहलीज़ पर खड़ी अविवाहित लड़की को अब घर से ताने मिलने लगे हैं। भाभियां उसे बोझ समझती हैं, दोनों भाई बात-बात पर टोकते रहते हैं। माता-पिता न चाहते हुए भी अपने बेटे-बहू के सामने उसे उल्टा-सीधा कहते हैं, ताकि बेटी को उनसे ज्यादा ...
मैं होकर भी, मैं अब नहीं आज की सुबह रोज की तरह नहीं थी। स्कूल के लिए उठाने वाली मां की आवाज ही नहीं आई, नाश्ते की टेबल पर दीदी का शोर सुनाई नहीं दिया, गेट के बाहर पापा की गाड़ी ने हॉर्न नहीं दिया। सबकुछ सुनसान-सा और हर शख्स परेशान सा दिखाई दिया। चारों तरफ अगर कुछ था, तो बस खामोशी। सब मौन थे, बावजूद इसके, परिवार के हर सदस्य की आंखें पूछ रही थीं आखिर मैंने ऐसा क्यूं किया? ऐसा नहीं है कि मैं परेशान नहीं हूं, मगर उनके सवालों का जवाब नहीं दे सकती। कभी नहीं दे सकती। मैं अंदर ही अंदर सोचती हूं कि काश उस पल को फिर से अपनी जि़ंदगी में लौटा सकूं, सबकुछ पहले की तरह कर सकूं, मगर...। मगर अब ये सब संभव नहीं है। कुछ भी संभव नहीं है। मैंने सबकुछ खो दिया पापा का प्यार, मां का दुलार, दीदी की फिक्र, दोस्तों की झड़प और अपना अस्तित्व। आज तक सिर्फ सुना था मृत शरीर को पंचतत्व में विलीन होना, उसे महसूस भी करके देख लिया। कहते हैं न किसी भी चीज की कद्र उसके पास में न रहने से होती है, मुझे भी हो रही है, माता-पिता से दूर जाकर उनकी कमी खल रही है। उन्हें भी मेरी गैरमौजूदगी खाए जा रही है। मैं उनके पास होते हुए भ...
सच है! हर एक फ्रैंड जरूरी होता है दोस्त और प्यार में एक बड़ा अंतर - प्यार कहता है- अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो मैं जी नहीं पाऊंगा, जबकि दोस्त कहता है - कि पागल, मेरे रहते तुझे कुछ हो नहीं सकता। प्यार की जगह दोस्त नहीं ले सकते और दोस्त की जगह प्यार नहीं ले सकता। रात के 2 बज रहे थे और नींद आंखों से दूर थी। मन उदास, दिमाग में उलझन और कशमकश, और तभी अचानक ये मैसेज, मैसेज के अंत में लिखा था- तुम्हारी हिडंबा। मैसेज बहुत पुरानी दोस्त का था, बरसों पहले मामूली सी बात पर लंबी नाक के चलते उससे आगे होकर कभी बात नहीं की। मगर ज़ेहन में वह हमेशा रही। वो दोस्त है, सच्ची दोस्त, यह उसने साबित कर दिया। सारे गिले-शिकवे भुलाकर सालों बाद मेरा नंबर जुगाड़कर आखिर उसने ही पहल की। हिडंबा (असली नाम कुछ और), मेरी दोस्त। उसकी कद-काठी के चलते हम उसे मजाक में इसी नाम से पुकारते थे। मैसेज पढऩे के बाद मैंने तेवर भुलाकर, गुस्से को जेब में रखकर रात को 2 बजे ही हिडंबा को फोन लगाया, पूरी रिंग जाने के बाद भी उसने फोन नहीं उठाया। इस बार मुझे गुस्सा नहीं आया, दोस्त के प्रति सकारात्मक रवैया रखते हुए मैंने सोचा- शायद सो गई होगी...
अपने ही हिंदोस्तान में हिंदी बन गई पराई 'देखो बेटा 'काउÓ आई। चलो उसे रोटी देंगे। बुलाओ- आजा काउ, आजा काउ।Ó दो साल के छुटके को उसकी मां गाय को रोटी देना सिखा रही थी। बच्चा काउ-काउ करके उसे बुला रहा था, और गाय जैसे काउ शब्द सुनकर बिदक रही थी। वह इंतज़ार में थी कि बच्चा प्यार से उसे 'गायÓ कहकर पुकारे, और वह मुंह घुमाकर बच्चे के हाथ से रोटी खा ले। गाय अपना मूल संबोधन खोना नहीं चाहती थी, और मां बेटे को काउ रटवाने के पीछे पड़ी थी। अंत में जब गाय को समझ आ गया कि दाल नहीं गलने वाली, तो वह रोटी की लालच में न पड़कर अपना आत्मसम्मान बचाते हुए पूंछ लहराती हुई दूसरी गली में मुड़ गई। पूरे दृश्य से इतना तो समझ आ गया कि एक मां अपने बच्चे को दो सबक सिखा रही थी। एक गाय को अंग्रेजी में काउ कहते हैं और दूसरा गाय को रोटी देते हैं। मां अभी से बच्चे को अंग्रेजी के आगे झुकाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। वह खुद भी हमें बताती है कि 'फल-फ्रूटÓ खाने से सिर में 'हैडेकÓ नहीं होता। अंग्रेजी के बजाए वह हिंदी बोलने में ज्यादा समर्थ है, मगर उसकी मजबूरी है। वह जानती है कि आजकल लोगों की पहचान अंग्रे...
घर का मुखिया, परिवार की मजबूत कड़ी कभी बड़ा-सा हाथ खरच और कभी हथेली की सूजन... मशहूर कविता की ये तहरीर हमारी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से और घर के मजबूत स्तंभ के बारे में लिखी गई हैं। पिछले कई सालों से सुबह ठीक पांच बजे उठने वाले उस शख्स के नियम में आजकल परिवर्तन आ गया है। पीठ सीधी करके चलने वाले उस व्यक्ति की कमर का झुकाव कुछ कहना चाहता है। कड़क आवाज़ के लिए मोहल्ले में मशहूर उस इंसान की अब रातों में कराहने की आवाज़ें सुनाई देने लगी हैं। ये सब जानकर उनके प्रति मेरी चिंता बढऩे लगी है। अंजाना डर सताने लगा है, पर मैं इतनी जल्दी उन्हें अपने से दूर होने नहीं दूंगी। अगर वो मेरे पिता हैं, तो मैं भी उनकी बेटी हूं। हठी हूं बिल्कुल उनकी तरह। आज किसी बात पर पिता का अनुभव सुनाया, तो समझ आया पिता कितने कीमती हैं। पिता बिना जीवन कैसा होता होगा, मैं नहीं जानती। मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हंू, जिनके सिर पर पिता का साया है और मैं प्रार्थनाओं में उनकी लंबी उम्र की हमेशा कामना करती हूं। मगर जैसा संसार का नियम है बेटी को विदा होना ही पड़ता है, इसलिए आज उनसे दूर होकर उनकी कमी का अहसास जरूर है। ...
चाबी है पड़ोस में... कल रात हमारे पड़ोस में एक चोरी हो गई। जिस घर में चोरी हुई, वो दो घरों के बीच में था। मैंने सोचा जब उस घर में चोरी हो रही थी, तब क्या अगल-बगल वालों को ज़रा भी आहट नहीं हुई! शायद हुई या शायद नहीं हुई या शायद आंखें खुली रखकर, कान बंद कर लिए गए या फिर ये सोचकर ज़बान बंद रही कि कौन बाहर जाकर मुसीबत मोल ले, अपने पर ही आ गई, तो?Ó ये बात अब कोई नई नहीं रही, आए दिन ये खबर सुनने में आती है कि फलाना के यहां चोरी हो गई और बगल वालों के कान में जूं तक नहीं रेंगी। मुझे सालों पहले का वह समय याद आ गया, जब हम 4-5 दिन के लिए शहर से बाहर जाते थे, तो बगल वाली शर्मा आंटी को अपने घर की चाबी दे जाते थे, ताकि उनके घर का एक सदस्य रात में हमारे घर रुके। और तब भी, जब मम्मी-पापा काम से कहीं बाहर जाते और घर पर ताला डालना होता, तब भी चाबी शर्मा आंटी या दुबे आंटी के यहां होती थी। हम स्कूल से लौटते तो दूर से ही हमें देखकर आंटी आवाज़ लगातीं, 'मिक्की, चाबी हमारे यहां है। आजा पराठे रखे हैं, खाकर चली जाना।Ó वह समय जब, पूरे मोहल्ले में सलीम अंकल के घर नया-नया टीवी आया था और आस-पड़ोस के सभी बच्च...
औपचारिकताओं से भरे माहौल में कौन है सच्चा? 'कैसी हैं बिंदु मैम, जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं। आप जिएं हज़ारों साल।Ó किसी ने बिंदु मैम को बर्थडे विश किया। जैसे ही बिंदु मैम ने उसके डिपार्टमेंट की सीमा पार की, उस बंदी ने मुंह टेढ़ा किया और 'बुरे लोगों की भगवान को भी जरूरत नहीं है लगता,Ó जैसी सत्रह बुराइयां करती हुई निकल ली वहां से। फिर किसी ने पूछा कि यार तुम तो उन्हें अभी-अभी बड़े प्यार से विश कर रही थीं, लंबी उम्र की दुआएं दे रही थीं, फिर अचानक इतनी चिढ़ क्यों? जब पसंद नहीं करती हो, तो सामने ऐसी नौटंकी की जरूरत क्या है? इस पर उस बंदी का जवाब था- क्या करें यार, फॉर्मेलिटी करनी पड़ती है। सीनियर है, पता नहीं, कब काम पड़ जाए उससे। बेवजह बुराई कौन मोल ले। बात यहीं आकर नहीं खत्म होती, आप जिसे नापसंद करते हैं, मुंह पर तो उससे शहद वाली वाणी में बोलेंगे, मगर आपका कोई साथी उससे बात करे, तो तुरंत टीम विभाजन कर देंगे- तू मेरी टीम में है या उसकी। बात बच्चों वाली ज़रूर है, पर ऐसी हरकतें पढ़े-लिखे समझदार वयस्क ही ज्यादा करते हैं। ये तो थी ऑफिस के वातावरण की एक झलक। घर के आस-पास भी तो ऐस...
विश्वास ही बनाता है इंसान को भगवान जीहां, एकमात्र प्रोफेशन, जिसमें कार्यरत आम आदमी भगवान की उपाधि पा जाता है - डॉक्टरी। धरती पर मौजूद ये भगवान लोगों को नया जीवन देने का काम करते हैं। हाल ही मैं मुझे एक अनुभव हुआ। मेरी परिचिता हॉस्पिटल में एडमिट हुईं। जिस वॉर्ड में वे एडमिट थीं, वहां आस-पास के बेड पर कुछ और मरीज भी थे। थोड़ी देर में ऊंची कद-काठी वाले, गोरे-चिट्ठे, आंखों पर चश्मा चढ़ाए, करीब-करीब 35-38 साल के एक व्यवस्थित नौजवान ने प्रवेश किया। वह बारी-बारी से सभी के हाल-चाल ले रहा था। पहले हमें लगा ऐंवई कोई बंदा होगा, जो दुनियादारी निभा रहा है, फिर जैसे ही उसने सिस्टर को आवाज लगाई, और मरीज की नब्ज पकड़कर उसका मर्ज जाना, तब जाके बात समझ आई कि ये तो डॉक्टर है, मगर जूनियर। बस ये भांपते ही कि वह जूनियर डॉक्टर है, परिचिता ने धीरे से कहा, 'अरे किसी सीनियर डॉक्टर को बुलाओ, ये अभी-अभी बना डॉक्टर कहां मेरा दर्द समझ पाएगा। ये तो प्रैक्टिस कर रहा है। देखा नहीं, स्टेथोस्कोप और एप्रिन भी नहीं पहना।Ó हालांकि उनकी बात से हम सहमत नहीं थे, मगर उनकी तसल्ली के लिए लगे सीनियर डॉक्टर को खोजने, तो पता च...
दिखावे की दुनिया और दुनिया में दिखावा छुरी को दाएं हाथ में पकड़ो, बाएं में नहीं। फलां चीज को कांटे पर इस तरह फंसाकर खाते हैं। खाना डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाया जाता है, आलथी-पालथी मारकर गंवार लोग खाते हैं। हाथ से दाल-चावल को खाना गंवारूपन है, उस पर उंगलियों को चाटकर खाना और आवाज़ करके खाना तो अनपढ़ों की निशानी है। ये सारी हरकतें मिडिल क्लास हंै, अच्छी सोसायटी में उठना-बैठना है, तो रहन-सहन के तौर-तरीके सीखने होंगे। कुछ तो अच्छे लक्षण लाओ अपने अंदर। बालों में तेल डालकर मत रखो, कंडीशनर इस्तेमाल करो। चश्मा नहीं, लैंस लगाया करो। स्टाइल में चलो। वो लोग देखो, कैसे रहते हैं, इसलिए तो सब उनके आस-पास घूमते हैं। ज्ञान-वान तो दूसरी और तीसरी पायदान पर है। याद रखो, जो दिखता है, वो ही बिकता है। उफ! बहुत सारे नियम-कायदे, ताने और बाने भी हैं इस मैनर्स सिखाती दुनिया में, कितने सारे फंडे जि़ंदगी जीने के। अपनी तरह से कुछ मत करो, दूसरों को देखकर चलो। एक-दूसरे से तुलना करते हो। मगर क्या सचमुच अच्छी जि़ंदगी जीने के सिर्फ यही फंडे हैं? अब यह देखिए - तुम बड़े ओहदे पर काम करते हो, बड़ी गाड़ी से आते हो। छोटी ग...
एक रुपए वाला मध्यप्रदेश देना मध्यप्रदेश ही नहीं, राजस्थान, चंडीगढ़, दिल्ली, हरियाणा, केरल हर प्रदेश की एक कीमत तय थी। कोई एक रुपए का मध्यप्रदेश लेना चाहता था, तो किसी को 10 रुपए वाले राजस्थान में रुचि थी। हर राज्य में छिपा था लखपति बनने का राज। मैं बात कर रही हूं भारत के कुछ यूनीक प्रोफेशन में से एक वर्षों पुराने लाटरी सिस्टम की। जैसे आज के समय में शेयर बाजार का बोल बाला है, ठीक उसी तरह बहुत पहले लाटरी सिस्टम की रौनक देखी जाती थी। तब हम जबलपुर में रहते थे। वहां मैंने हर वर्ग, हर उम्र के व्यक्ति को लाटरी खरीदते देखा। लड़का हो या लड़की, महिला हो या पुरुष, बच्चे हों या बूढ़े लाटरी खरीदकर सभी अपनी किस्मत आज़माने को लालयित नज़र आते थे। तब बच्चे पिगीबैंक में सिक्का डालने के बजाए उस एक रुपए से लाटरी खरीदकर अपना भाग्य देखने को आतुर नजर आते थे। क्या पता किसका सिक्का मार्केट में चल जाए। जैसे गली-चौबारों में किराने की दुकानें होती थीं, ठीक उसी की तर्ज पर लाटरी की दुकानें भी खोली गई थीं। दुकानों पर चिपका कोई विशाल आकार का लाटरी टिकट का पोस्टर किसी फिल्मस्टार के पोस्टर से भी ज्यादा आकर्षक होता ...
कल मरना है, तो क्यों न आज जी लें... अभी बस पांच मिनट पहले एक जनाब का एसएमएस आया, जिसमें मशहूर पंक्तियां लिखी थीं- बिना लिबास आए थे इस जहान में, बस एक क$फन की ख़ातिर इतना स$फर करना पड़ा... अभी मुंह से वाह! भी ठीक से न निकली थी कि तभी अचानक नजदीक में हो रहे शोर-गुल ने ध्यान खींच लिया। पता चला, कुछ लोग फलां व्यक्ति को पांच बार आए हार्ट अटैक को लेकर बतिया रहे थे। हर बार हार्ट अटैक आने के बाद फलां व्यक्ति कुछ दिनों के इलाज में तंदुरस्त हो जाता था। बस, यहीं आकर यह सीरियस बात मजाक का विषय बन गई और सभी लोग एकसाथ ठहाका मारकर हंसने लगे। इसी तर्ज पर दूसरे ने एक और उदाहरण की तरफ प्रकाश डाला कि बार-बार हार्ट अटैक झेल रहे किसी व्यक्ति के मुंह में जब भी आशंकावश गंगाजल डाला जाता, वह चंद लम्हों बाद उसी गंगा से चंगा हो जाता। अब तो डॉक्टर ने भी संकोच में कहना छोड़ दिया कि अगला हार्ट अटैक फलां व्यक्ति के जीवन के लिए भारी पड़ सकता है। बेचारे, हर बार शर्मिंदगी का शिकार बने। कोई मजाक है क्या! ये अलग बात है कि डॉक्टर ने भी दबी हंसी को आखिर फूट पडऩे दिया और कहा- भई आखिरी समय का सोचकर मुंह में डाला गया य...
रिश्ते को मजबूती देती समझ का दायरा सास-बहू से इतर शुरू हुए एक नए धारावाहिक पर जाकर रिमोट रुक गया। भारी-भारी लदे हुए गहने, जरी-गोटे वाली साडिय़ां, आधी मांग तक भरे सिंदूर और उस पर खलनायिकाओं के आए दिन नए दांव-पेंच को भुलाते हुए पति-पत्नी के रिश्तों की एक खूबसूरत कहानी ने प्रभावित किया। पहली ही कड़ी ने मियां-बीवी को आपस में समझने का बहुत अच्छा मौका दिया। कड़ी में हुआ कुछ इस तरह कि...... सुबह ऑफिस के लिए हंसते-हंसते विदा करती पत्नी की तारीफ में कहने के लिए पति को शब्द नहीं मिल रहे थे और शाम को किसी बात पर खफा हो जाने पर उसी पति ने अपनी पत्नी को काफी बुरा-भला कह दिया- 'तुम बदल गई हो, वो नहीं हो जिससे मैंने प्यार किया... शादी की!Ó अभी बात गले से नीचे नहीं उतरी थी कि थोड़ी ही देर बाद वही पति आत्मग्लानि से भरा नजर आया। उसे अहसास हो गया था कि उसने पत्नी पर गलत गुस्सा किया है। दरअसल स्त्री ने पत्नी का दायित्व निभाने से ज्यादा जरूरी मां का फर्ज निभाना समझा। बस, पति समझ गया कि उसकी प्रेमिका अब पत्नी ही नहीं, बल्कि मां भी है। जब असल बात पति को समझ आई, तो उसने कुछ ऐसा कह दिया, जिसमें किसी भी ...
एक घर में जाता है, दूसरा घर से जाता है आज ऑफिस आते वक्त एक खूबसूरत घर के सामने से निकलना हुआ, जहां कुछ फंक्शन चल रहा था, माहौल से और घर की सजावट से साफ पता चल रहा था कि कार्यक्रम गृहप्रवेश का था। मैंने अपने दोस्त से कहा, कितने लकी हैं, जो खुद के घर में प्रवेश करने जा रहे हैं। मगर मेरे दोस्त की नजर गृहप्रवेश कर रहे परिवार की जगह उन लोगों पर थी, जो ईंट के बने एक छोटे से अस्थाई घर से अपना बोरिया-बिस्तर बांध रहे थे। उसने मेरे सवाल के जवाब में जो कहा, वो सच में बहुत गहरी सोच थी। उसका कहना था- कितने असमर्थ हैं ये लोग, जिन्होंने दिन-रात मेहनत, घर की चौकीदारी करके किसी और के लिए ये खूबसूरत आशियाना बनाया, और आज जब घर के मालिक अपना गृहप्रवेश कर रहे हैं, तो वे बेघर हो रहे हैं। शायद यही उनकी नियति है। भला दूसरों के घर बनाने वालों का अपना कोई ठिकाना भी हो सकता है! वहां से निकलने के बाद मेरे दिमाग में दोस्त की वही बातें कौंधती रहीं। मुझे अचानक वो मजदूर परिवार याद हो आया, जो कभी हमारे घर के सामने बन रहे एक मकान में काम कर करने आया था। सास-ससुर, पति-पत्नी और उनके तीन बच्चे। सारे के सारे मकान का का...
मोहल्ले में बसता हुआ एक आम आदमी  साइकल से उतरते वक्त एक बुजुर्ग की जेब से सिक्का गिर गया। बस वे लगे 10 मिनट तक यहां-वहां उस सिक्के को खोजने। कभी साइकल के नीचे देखते, तो कभी दाएं-बाएं खोजते। यही नहीं, उन्होंने एक ही जगह पर कइयों बार उसे देखा, मगर सिक्का तो जैसे उनसे आंख मिचौली खेल रहा था। ऐसी जगह छुपकर बैठा, जहां उन बुजुर्ग का ध्यान जाना ही नहीं था। अब उनके सब्र का बांध टूट रहा था, धीरे-धीरे उनके चेहरे पर शिकन आने लगी। सिक्का जि़द्दी था, तो सज्जन हठी। वह सोच रहा था कि किसी भी तरह नजर नहीं आऊंगा, मगर बुजुर्ग डटे थे कि उसे उठाकर दोबारा जेब में रखकर ही दम लेंगे। आखिर लंबे इंतज़ार के बाद एक की जीत हो गई, जीहां, बिना शक- बुजुर्ग की। ये और कोई नहीं एक आम आदमी ही है, जो मात्र एक के सिक्के के लिए दस मिनट अपना खून जलाता रहा। उस सिक्के की कीमत उनसे बेहतर और कोई नहीं जान सकता। महंगाई इन जैसे लोगों के लिए ही बढ़ती है, ये कहना ज्यादा गलत न होगा। ऐसे आम आदमी हमें राह चलते कई मिल जाएंगे, जिनकी पाई-पाई जोड़ते हुए आधी से ज्य़ादा जि़ंदगी दो पहिया में गुज़र गई। इन्हीं लोगों पर लगा होता है ईमानदारी ...
अच्छा हो, इंसान की तरह पेश आएं ... कई बार पढ़े-लिखे लोग भी ऐसी हरकत कर बैठते हैं, जिससे वे न सिर्फ खुद को अपमानित करते हैं, बल्कि पूरे समाज को कटघरे पर लाकर खड़ा कर देते हैं। एक बार अपने बर्ताव पर नज़र डालिए, अगर आप सामने वाले की जगह होते, तो क्या वैसा ही व्यवहार अपने लिए बर्दाश्त कर पाते... हमारे देश में आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो देश के काम में लोगों की कोई मदद नहीं करते, फिर भले ही उस मदद में उनका ही फायदा क्यों न हो। इसका एक उदाहरण मुझे कुछ दिनों पहले देखने को मिला। हुआ यूं कि शाम सात बजे करीब एक सज्जन ने आकर हमारे घर पर दस्तक दी। मां का घर इसलिए लिखा, क्योंकि मैं शादीशुदा हूं और मेरा घर भी उसी कॉलोनी में है। अत: मैं उनसे मिलने घर गई हुई थी। खैर, मैं उस वक्त मोबाइल पर थी, मैंने जल्दी-जल्दी बात खत्म की और उन सज्जन से मुखातिब हुई। वे सज्जन सरकारी कर्मचारी थे और जनगणना के लिए हमारी कॉलोनी के दौरे पर निकले थे। मैंने उन्हें बैठने को कहा और उन्होंने अपना फॉर्म वगैरह निकालकर हमसे जानकारी लेनी शुरू की। इस बीच मैंने बेटे को आवाज़ लगाकर उन्हें एक गिलास पानी पिलाने को कहा। फॉर्म भरत...
तुम यूं बिना कुछ कहे क्यों चली गईं दिन 13 मई, वक्त शाम का, जगह कानपुर। खबर आई कि खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर ली। कानपुर से यूं तो मेरा कोई सीधा संबंध नहीं है। मेरा वहां कोई घरोबा नहीं था, मगर फिर भी एक लगाव तो था, जो अब नहीं रहा, बल्कि इस शहर के नाम से दूरी जरूरी बन गई है। कोई रहता था मेरा, जिससे न तो खून का रिश्ता था, न रिश्तेदारी। 14 जून सुबह का वक्त, खाने की तैयारियों में लगी मैं दौड़-भाग कर रही थी कि अचानक मोबाइल बजा। आवाज सहेली की थी। एक मिनट तक तो वो रोती रही, मैं समझ नहीं पाई, बस उसे चुप कराने में लगी थी। धीरे-धीरे जब उसने खुद को संभाला, तो बस इतना ही बोली- संध्या ने 13 मई को आत्महत्या कर ली। मैं स्तब्ध। न कुछ बोलते बना, न कुछ सुनते। कहकर उसने फोन काट दिया। मैं किचन से निकली और खुद को ये यकीन दिलाने लगी कि हो सकता है मैंने गलत सुना हो। अभी दिसंबर में ही तो मिली थी उससे। हम दस सालों बाद मिले, लेकिन उसी गर्मजोशी से, जैसे बचपन में रोज स्कूल में मिलाकर करते थे। फिर अचानक, क्यों, कैसे? काश, उसने एक बार अपने जीवन में चल रही परेशानियों के बारे में जि़क्र किया होता, तो शायद हम सारे...
कहीं कुछ भूल तो नहीं रहे आप आज बच्चों का रिज़ल्ट आया है। रिपोर्ट कार्ड देखकर एक मां अपने बच्चे को डांट-फटकार लगा रही थी। दरअसल बच्चा पिछले साल की तरह इस साल क्लास में फस्र्ट नहीं आया। तीसरी कक्षा में पढऩे वाले इस नन्ही उम्र के बच्चे के दिमाग में यह बात गहरे तक बैठ गई है कि नंबर वन पर पहुंचने के बाद भी उसे, उस पर बने रहने की लड़ाई हमेशा करनी है। 'नंबर वन पर पहुंचकर लोगों की नज़र में नंबर वन बने रहना बहुत मुश्किल है।Ó बहुत बार सुना और कइयों बार सउदाहरण देखा। हैं आस-पास बहुत से लोग, जिन्होंने आधी जि़ंदगी नंबर वन पर पहुंचने की जद्दोजहद में लगा दी और बची जि़ंदगी उस पर बने रहने की मशक्कत में गुजार रहे हैं। मगर वे कभी इस 'नंबर वन पर बने रहनेÓ का सार समझने की कोशिश नहीं करते। जानते सभी हैं, मगर मानते कुछ ही लोग हैं कि कोई भी व्यक्ति अकेले कोई सफलता हासिल नहीं करता, उस सफलता को पाने में कई लोग उसके पीछे होते हैं। जब आप अपने श्रेष्ठ कामों के लिए स्टेज पर खड़े होकर मैडल ले रहे होते हैं, तो उन लोगों को कभी न भूल जाएं, जिन्होंने आपको मंजिल तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया। वास्तव में उन्ह...
ऐसे पीडि़त पुरुष की परेशानी कौन समझेगा? हर बार औरतें ही दया की पात्र नहीं होतीं, कभी-कभी पुरुषों के हाल पर भी मन व्यथित हो जाता है। लंबे समय से मि. परेशान (हमने उनका यही नाम रखा है) की गतिविधियों ने आखिरकार पुरुषों के लिए बंधी बधाई सोच को डगमगा दिया। जिस तरह पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, ठीक उसी तरह महिला वर्ग हो या पुरुष वर्ग हर जगह अपवाद मिल जाते हैं। अगर पत्नियां पतिपीडि़त हो सकती हैं, तो कहीं-कहीं पति भी पत्नीपीडि़त होते हैं, यकीनन। आज सूरज पश्चिम से निकलता था, दरअसल मि. परेशान बड़ी मुश्किल से आज समय पर ऑफिस आ पाए। काम का श्रीगणेश करने बैठे ही थे कि उनके मोबाइल पर सुबह की पहली रिंग बजी। चेहरे के हाव-भाव देखकर सहजता से अंदाजा लग गया कि फोन घर से था। भोंपू की तरह चिल्लाने  वाले शख्स की आवाज बीवी के फोन पर गले से निकलती ही न हो जैसे। 'हां, अभी आया हूं, लेकिन...,फिर...,तो...,मगर...,सुनो...,कहां...।Ó और फोन कट। सवाल करने का हक उनको कतई नहीं मिला, सिर्फ सुनो और जैसा कहा जाए, वैसा करो। गले का वॉल्यूम धीमा होने के बावजूद आस-पास के लोगों का ध्यान उनकी ही तरफ था। यह देख एक अच्छे ...
सिर्फ अहसास है, ये रूह से महसूस करो.... प्यार, मुहब्बत, इश्क...! आधुनिकता की धारा में बहते लोगों ने इन लफ्ज़ों की परिभाषा ही बदल दी है। अब प्रेम के इन मीठे शब्दों के मायने तक फीके हो गए हैं। कोई यह कैसे बताए कि किसी खास दिन हाथ में महज़ एक फूल लेकर 'उसेÓ 'आई लव यूÓ कह देना भर प्यार नहीं होता। सच्चे प्यार का तो अहसास मात्र दो लोगों को कभी न टूटने वाली डोर में बांधे रखता है। दरअसल ये सारी बातें मेरे दिमाग में कुछ दिनों से चल रहे किसी कार के एक टीवी विज्ञापन की वजह से कौंदीं, जिसमें ड्राइव कर रही एक लड़की अपने बॉयफ्रैंड को घर पर छोड़ती है और जैसे ही वह मुड़कर घर की तरफ चलना शुरू करता है, लड़की कार की डिक्की खोलती है, जिसमें से उसका दूसरा बॉयफ्रेंड निकलता है।  थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं, प्यार तो वह था, जो हमारे नाना और नानी, दादा और दादी के बीच था। या मोहब्बत तो वह है, जो आज भी मेरे पापा और मां के बीच है। अब तो प्यार मार्केट वैल्यू से चलता है। इश्क की मैनुफैक्चरिंग होने से पहले ही एक्सपायरी डेट आ जाती है। मेरी नानी बताती थीं कि उनकी शादी तय होने और शादी के बाद अपने कमरे में ज...
शायद तब समझे एक मां की फिक्र बहुत बार सुना कि जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो माता-पिता के दोस्त बन जाते हैं। बेटे का पैर पिता के जूतों में बन जाए, तो पिता बेटे से तेज आवाज़ में बात करने से पहले दो बार सोचता है या फिर जब बेटी मां के कद को पार कर जाए, तो मां के अंदर दोस्त ढूंढने लगती है। मैं भी मां हूं। मेरी बेटी भी मेरे कद को पार कर रही है, मैंने हमेशा उसे अपनी परछाई ही समझा। मगर ऐसा कुछ नहीं हो रहा, जैसा सुनती आ रही हूं। सबकुछ उलटा-पुलटा सा हो रहा है, 18 साल की मेरी बेटी मुझे अपना दोस्त नहीं, बल्कि दुश्मन समझती है। हर माता-पिता की तरह हमने भी घर में एक अलग कमरा उसके लिए तैयार किया। मगर मुझे क्या पता था कि मैं सिर्फ उसका कमरा ही अलग नहीं कर रही, बल्कि अपनी परछाई को खुद से अलग कर रही हूं। उसका कमरा क्या अलग हुआ, उसने तो अपनी दुनिया ही अलग बसा ली। मुझे अपने कमरे में आता देखकर वह मोबाइल पर बात करना बंद कर देती है, उसके कमरे में चारों तरफ नजर नहीं दौड़ा सकती, वरना वो ताक-झांक करने का इल्जाम लगा देती है। मैं समझ नहीं पा रही कि आखिर मेरी परवरिश में कहां-क्या गलती हो गई। हर वक्त यही डर लगा ...
रिश्तों का पर्याय बनते अवकाश लोगों का अब रिश्तों पर से विश्वास उठने लगा है। मगर इस विश्वास को कमजोर बनाने में गलती किसी एक की कभी नहीं होती। इस दुनिया में मुश्किल कुछ भी नहीं, फिर भी लोग इरादे तोड़ देते हैं। अगर सच्चे दिल से बनाया हो रिश्ता, तो सितारे भी किसी के लिए अपनी जगह छोड़ देते हैं। अभी-अभी रक्षाबंधन होकर गया है। जन्माष्टमी तक चलने वाले इस त्योहार की धूम समय के साथ फीकी पड़ती-सी लग रही है। ऑफिस में कुछ लोग मायूस थे, इसलिए नहीं कि लड़कियां अपने भाइयों को राखी नहीं बांध पाईं या लड़के अपनी बहनों से रक्षासूत्र नहीं बंधवा पाए, बल्कि इसलिए कि उन्हें राखी वाले दिन भी ऑफिस आना पड़ा। भले ही किसी की बहन या किसी का भाई उस शहर में रहता ही न हो, मगर अवकाश तो मिल जाता न। 'एक छुट्टी मारी गई,Ó लोग दबी ज़बान से कह रहे थे। वैसे भी आजकल बहुत से लोगों के लिए त्योहार का पर्याय अवकाश ही हो गया है। सचमुच समय के साथ रिश्ते भी करवट लेते जा रहे हैं। दूरदराज में रहने वाली बहनें लिफाफों में बंद राखी के साथ अब हल्दी-चावल रखना लगभग भूल चुकी हैं। उस दिन रोज के मुकाबले मिसेज शर्मा ने फोन पर देर तक बात ...
समय को नहीं, खुद को करें व्यवस्थित अभी तो मेरे पास बिल्कुल भी टाइम नहीं है... इस वक्त तो टाइम नहीं है बाद में मिलते हैं, फिलहाल बहुत बिजी चल रही हंू...यार टाइम नहीं मिल रहा, वगैरह-वगैरह...कब तक चलेंगे ये बहाने, अब तो इनसे पार पाइए.... आपने बहुत अक्सर ऐसे जुमले सुने होंगे, या यूं कहें आप भी ऐसे वाक्य किसी न किसी से कहते होंगे। दरअसल समस्या घड़ी के कांटों में नहीं है, बल्कि हमारी ही जीवनचर्या में कहीं न कहीं खोट है, जिसे हम समय की मार कहकर सीधे-सीधे बच निकलते हैं। आज के दौर में किसी के पास भी समय नहीं है, मगर समय निकाला जरूर जा सकता है। अब इस बात को आप कतई टाइम मैनेजमेंट से न जोड़ें। कुछ देर के लिए मैनेजमेंट गुरुओं के टाइम मैनेजमेंट पर पढ़ाए पाठ को भूलकर खुद पर ध्यान केंद्रित कीजिए और सेल्फ मैनेजमेंट की तरफ रुख कीजिए। समय की टिक-टिक को तो बांधा नहीं जा सकता, मगर खुद को तो व्यवस्थित किया जा सकता है न! इसी का नाम है - सेल्फ मैनेजमेंट, जिसका मुख्य बिंदु आप स्वयं हैं, इसलिए खुद को व्यस्थित करने का प्रयास करें।  बच्चे को स्कूल प्रोजेक्ट में आपकी मदद चाहिए, आपने कहा अभी टाइम नहीं है बाद म...
काश! ब्लैकबेरी और एप्पल मात्र फल रहते करीब दो वर्ष पहले मेरे एक सहकर्मी और दोस्त दिल्ली शिफ्ट हो गए, उन्हें वहां अच्छे ओहदे और वजनदार वेतन पर प्रतिष्ठित लोगों के बीच जगह मिली। लंबे अंतराल के बाद जब हमारी बातचीत हुई, तो पहले मैं पूर्वधारणाओं से ग्रस्त थी कि नाम-दाम होने के कारण कहीं वे बदल न गए हों, मगर सोच के विपरीत वे पहले की ही तरह सौ प्रतिशत जमीन से जुड़े महसूस हुए। हर तरफ से सुविधा-संपन्न होने के बावजूद वे उसी तरह सादा जीवन बिता रहे हैं। आज भी उनके पास न महंगा मोबाइल है, न महंगी गाड़ी और न महंगे शौक। उनका मानना है कि जरूरतें जितनी कम होती हैं, ज़मीर उतना ही मजबूत होता है। वे छोटी जगह से जरूर हैं, पर सोच छोटी नहीं है। फिल्हाल वे ऑफिस की ओर से विदेश यात्रा पर जाने की तैयारी में लगे हैं। बड़े-बुज़ुर्गों से सुनते आ रहे थे कि लोगों की पहचान उनके व्यवहार से होती है। लदा हुआ पेड़, झुका हुआ यानी जो जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा, गर्म जेब, हुनरमंद, योग्य होता है, उसे उतना ही स्वभाव से नर्म होना चाहिए। इसका जीता-जागता उदाहरण भी देख लिया। मगर इसके ठीक उलट आजकल कुछ लोगों को ब्रांडेड चीजों के पीछे...
वो गर्मियों की छुट्टियां और आम-अमरूद के पेड़ कुछ साल पहले भव्य मकान बनाने के चलते ननिहाल में वर्षों से विराजमान आम का पेड़ बलि की बेदी चढ़ गया। यह पहला सदमा नहीं था जब कोई फलता-फूलता वृक्ष आंगन से अपनी विदाई ले रहा था। इससे पहले अमरूद के झाड़ ने अपना बलिदान दिया था। एक के जाने के बाद दूसरे का जाना बची-खुची पूंजी के खत्म होने जैसा था। शुक्र है नानी के आखिरी वक्त तक ये पेड़ उनके सामने कद्दावर की तरह खड़े थे। मामाजी ने बड़े दुलार से अमिया और अमरूद के दोनों वृक्षों को अपने आंगन में रोपा था। हम गर्मी की छुट्टियों में मामाजी के घर आते, तो निगाहें हमेशा दोनों पेड़ों में लगे फल की तरफ होतीं। 'कच्चे मत तोडऩाÓ मामी हमारी नीयत भांपते ही कड़ी पाबंदी लगा देतीं। बचपन से मीठे-मीठे आम देने वाले इस वृक्ष से बहुत सारी मीठी यादें भी जुड़ी हैं। नानी फल आने के बाद हमें ताजा-ताजा अमिया का अचार खिलाती थीं, जिसका स्वाद आज भी जीभ को जस का तस है। गर्मियों में आम के पेड़ की छाया में नानी ने सूपे भर-भर के सैवंयां हाथ से तोड़ी हैं, जिनके स्वाद तो क्या बनावट की तुलना तक बाजार की कोई सैवंया कंपनी नहीं कर...